"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

“दिन आ गये हैं प्यार के” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

नाइस
मान्यवर !
आज से मेरा नया ब्लॉग “नाइस”
बच्चों अर्थात् नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित है !

खिल उठा सारा चमन, दिन आ गये हैं प्यार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।


चहुँओर धरती सज रही और डालियाँ हैं फूलती,
पायल छमाछम बज रहीं और बालियाँ हैं झूलती,
डोलियाँ सजने लगीं, दिन आ गये शृंगार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।


झूमते हैं मन-सुमन, गुञ्जार भँवरे कर रहे,
टेसुओं के फूल, वन में रंग अनुपम भर रहे,
गान कोयल गा रही, दिन आ गये अभिसार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।


कचनार की कच्ची कली भी, मस्त हो बल खा रही,
हँस रही सरसों निरन्तर, झूमकर कर इठला रही,
बज उठी वीणा मधुर सुर सज गये झंकार के।
रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।


(चित्र गूगल सर्च से साभार)


@ भारतीय नागरिक - Indian Citizen जी!
आपकी टिप्पणी के बारे में तो केवल इतना ही निवेदन है-

नही जानता कैसे बन जाते हैं,

मुझसे गीत-गजल।

जाने कब मन के नभ पर,

छा जाते हैं गहरे बादल।।


ना कोई कापी या कागज,

ना ही कलम चलाता हूँ।

खोल पेज-मेकर को,

हिन्दी टंकण करता जाता हूँ।।


देख छटा बारिश की,

अंगुलियाँ चलने लगतीं है।

कम्प्यूटर देखा तो उस पर,

शब्द उगलने लगतीं हैं।।


नजर पड़ी टीवी पर तो,

अपनी हरकत कर जातीं हैं।

चिड़िया का स्वर सुन कर,

अपने करतब को दिखलातीं है।।


बस्ता और पेंसिल पर,

उल्लू बन क्या-क्या रचतीं हैं।

सेल-फोन, तितली-रानी,

इनके नयनों में सजतीं है।।


कौआ, भँवरा और पतंग भी,

इनको बहुत सुहाती हैं।

नेता जी की टोपी,

श्यामल गैया बहुत लुभाती है।।


सावन का झूला हो,

चाहे होली की हों मस्त फुहारें।

जाने कैसे दिखलातीं ये,

बाल-गीत के मस्त नजारे।।


मैं तो केवल जाल-जगत पर,

इन्हें लगाता जाता हूँ।

क्या कुछ लिख मारा है,

मुड़कर नही देख ये पाता हूँ।।


जिन देवी की कृपा हुई है,

उनका करता हूँ वन्दन।

सरस्वती माता का करता,

कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. Bahut sundar Prashansha arjit rachana...!!
    http://kavyamanjusha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. किसी दिन पाठकों को यह राज या गुर भी बता दें कि आप इतनी बढ़िया रचनायें कैसे सृजित करते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  3. कचनार की कच्ची कली भी, मस्त हो बल खा रही,
    हँस रही सरसों निरन्तर, झूमकर कर इठला रही,
    बज उठी वीणा मधुर सुर सज गये झंकार के।
    रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।

    bahut hi sundar geet.........dil jhoom utha.

    उत्तर देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. ye to kamaal ho gaya aapne to tippani mein hi ek aur rachna gadh di........bas aap aise hi likhte jaiye aur hamein aanandit karte jaiye.
    mere khyal se indian cityzen ji aapki kamna poori ho gayi hogi.dekha kaise khel khel mein shastri ji ye kamaal karte hain.

    उत्तर देंहटाएं
  6. शाश्त्री जी, आप तो बात भी करते हैं तो कवितामय शब्द निकलते हैं आपके मुंह से. साक्षात सरस्वती मां ही विराजती है आप की जबान पर. बहुत सुंदर, युं ही बरसाते रहिये.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  7. जिन देवी की कृपा हुई है,
    उनका करता हूँ वन्दन।
    सरस्वती माता का करता,
    कोटि-कोटि हूँ अभिनन्दन।।

    सचमुच उन्‍हीं की कृपा है सब !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. कचनार की कच्ची कली भी, मस्त हो बल खा रही,
    हँस रही सरसों निरन्तर, झूमकर कर इठला रही,
    बज उठी वीणा मधुर सुर सज गये झंकार के।
    रीझने के खीझने के, प्रीत और मनुहार के।।
    mमंयक जी आपकी इस रचना ने आते ही धूम मचा दी है ।बहुत सुन्दर इस नये ब्लाग के लिये बहुत बहुत बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुन्दर गीत बन पड़ा है और अपनी रचना प्रक्रिया को भी कविता में बखूबी अंजाम दिया है आपने.

    उत्तर देंहटाएं
  10. Sach Aadarniya Mata Saraswati ki bahut badi kripa hai aap par....ham to dekh kar hatprabh hai ki aap ye kamaal kese karte hai..!

    उत्तर देंहटाएं
  11. नन्हीं कलियों और सुमनों को
    समर्पित ब्लॉग "नाइस" बनाकर
    आपने बहुत सराहनीय कार्य किया है!
    --
    गीत तो सुंदर है ही!

    --
    कह रहीं बालियाँ गेहूँ की - "वसंत फिर आता है - मेरे लिए,
    नवसुर में कोयल गाता है - मीठा-मीठा-मीठा! "
    --
    संपादक : सरस पायस

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत सुंदर रचना ओर चित्र.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  13. रचना और चित्र दोनों ही बहुत ख़ूबसूरत लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  14. वाह! वाह! शास्त्री जी आनंद आ गया.
    आपने लिंक देकर मुझे निहाल कर दिया.
    आपको शत शत प्रणाम.

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails