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बुधवार, 23 जून 2010

“दोहे” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

बेमौसम आँधीं चलें, दुनिया है बेहाल।
गीतों के दिन लद गये,गायब सुर और ताल।।

----
नानक, सूर, कबीर के , छन्द हो गये दूर।
कर्णबेध संगीत का , युग है अब भरपूर।।
----

रामराज का स्वप्न अब, लगता है इतिहास।
केवल इनके नाम का, राजनीति में वास।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. ekdam sahi bat kahi hai apne...ramrajy ki bate to ab kitabo me hi rah gayi hai..

    achhi prastuti...

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर अभिव्यक्ति ,शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. दुनिया बड़ी खराब है उल्टी इसकी रीत।
    फिर हम भूलें नहीं दया धर्म और प्रीत।

    उत्तर देंहटाएं
  4. नानक, सूर, कबीर के , छन्द हो गये दूर।
    कर्णबेध संगीत का , युग है अब भरपूर।।
    ----
    सही कहा है आपने। अब मानवीय संवेदना, लोकाचार का नहीं, गुल्लक तोड़कर टनटनाने का प्रतीक ज्यादा है। कान-फाड़ संगीत, नृत्य के नाम पर मस्ती करती भीड़, पता नहीं यह कहां ले जाएगा हमारी संस्कृति पंरपराओं को।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और सार्थक दोहे।

    उत्तर देंहटाएं
  6. रामराज का स्वप्न अब, लगता है इतिहास।
    केवल इनके नाम का, राजनीति में वास।

    सुंदर .. सटीक ... सार्थक ... मनभावन दोहे .... लाजवाब शास्त्री जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  7. दोहों के माध्यम से गंभीर बातें कही हैं...सटीक

    उत्तर देंहटाएं

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