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बुधवार, 9 जून 2010

“व्यञ्जनावली-अन्तस्थ” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


antasth

“य”

“य” से यति वो ही कहलाते!

जो नित यज्ञ-हवन करवाते!

वातावरण शुद्ध हो जाता,

कष्ट-क्लेश इससे मिट जाते!

“र”
“र” से रसना को लो जान!
रथ को हाँक रहे भगवान!
खट्टा, मीठा और चरपरा,
सबकी है इसको पहचान!


“ल”
“ल” से लड्डू और लंगूर!
लट्टू घूम रहा भरपूर!
काले मुँह वाले वानर को,
हम सब कहते हैं लंगूर!!


“व”
“व” वन, वनराज महान!
जंगल जीवों का उद्यान!
वर्षा –ऋतु में भीग रहे हैं,
खेत, बाग, वन और किसान!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात है , चित्र बहुत प्यारे सजाये है ,इस स्वर लहरी में शास्त्री जी !

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  2. "क" कहता है काम करो,
    तब "ख" कहता है, खाओ.
    "ग" कहता है गलत न बोलो,
    "घ" कहता, घर जाओ।
    -----
    बहुत सुन्दर तरीके से अन्तस्थों के बारे में बतलाया, आपने। धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर रचना....और चित्र भी बिलकुल सार्थक

    उत्तर देंहटाएं
  4. aaj main sweekaar karta hoon sareaam ki aap ka koi jawaab nahin hai shrimaan !

    pasand **************

    उत्तर देंहटाएं
  5. चित्र और रचना दोनों ही अपने उद्देश्य की पूर्ति कर रहे हैं ....
    आभार ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. एक बार फिर आपके लेखन को नमन्…………अति सुन्दर्।

    उत्तर देंहटाएं
  7. लो जी, इसी बहाने हमने ककहरा याद कर लिया। शुक्रिया।
    --------
    ब्लॉगवाणी माहौल खराब कर रहा है?

    उत्तर देंहटाएं

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