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शनिवार, 26 जून 2010

“आसमान में छाये बादल!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

IMG_1525जल से भर कर लाये छागल!   
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!! 


कुछ भूरे कुछ श्वेत-श्याम हैं,  
लगते ये नयनाभिराम हैं,  
नील गगन की चूनरिया पर,  
शैल-शिखर बन भाये बादल!  

उमड़-घुमड़ कर आये बादल!! 


उमड़-घुमड़ कर आये बादल!! 
खेत सरोवर सब सूखे थे,  
उपवन पानी बिन रूखे थे,  
प्यास बुझाने को धरती की,  
रिम-झिम बारिश लाये बादल!  
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!! 


बागों में झूले चहके हैं,  
ललनाओँ के मन महके हैं,  
गातीं मेघ-मल्हार  दुल्हनियाँ,   
झूल रही है कंचन काजल!  
उमड़-घुमड़ कर आये बादल!!   


दादुर, मोर, पपीहा, कोयल,   
सरिता राग सुनाती कल-कल,  
चपला चम-चम चमक रही  है,  
आसमान में छाये बादल! 

उमड़ घुमड़ कर आये बादल!!

12 टिप्‍पणियां:

  1. बधाइयाँ बहुत बहुत बधाइयाँ,
    बदल आये तो अब बरखा भी आएगी !
    अपने साथ ढेरो खुशियाँ भी लाएगी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत खूबसूरत गीत...पर अभी हम दिल्लीवासी तो तरस रहे हैं यह नज़ारा देखने को....आपकी रचना से कल्पना में ही सही मन आनंदित कर लिया .

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह वाह्………………यहाँ भी आये और थोडी राहत दे गये बादल्………………बहुत सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  4. यहां तो पिछले 6 दिन से बादलों की कृपा हो रही है!

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर कविता जी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह.. वाह शास्त्री जी
    इधर छत्तीसगढ़ में दो दिनों ठीक-ठाक बारिश हो रही है। आपकी रचना को पढ़कर मैं बादलों के कामकाज के बारे में सोचने लगा हूं। किसी शायर ने बादलों को आवारा की संज्ञा भी दी है। शायद शायर ने ठीक ही कहा हो।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 27.06.10 की चर्चा मंच (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  8. बेहद ख़ूबसूरत कविता! सुन्दर प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं

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