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गुरुवार, 24 जून 2010

“मृत्यु एक मछुआरा-बेंजामिन फ्रैंकलिन” (अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“DEATH IS A FISHERMAN”  
– BY BENJAMIN FRANKLIN
अनुवाद-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”
दुनिया एक सरोवर है,
और मृत्यु इक मछुआरा है!
हम मछली हैं अवश-विवश सी,
हमें जाल ने मारा है!!


मछुआरे को हम जीवों पर 
कभी दया नही आती है!
हमें पकड़कर खा जाने को,
मौत नही घबराती है!!


तालाबों में झूम रहा है
जाल मृत्यु बन घूम रहा है!
मछुआरा चुन-चुन कर सबको
बेदर्दी से  भून रहा है!!


आये हैं तो जाना होगा
मृत्यु अवश्यम्भावी है!
इक दिन तो फँसना ही होगा,
जाल नही सद्-भावी है!!
BENJAMIN FRANKLIN

Philadelphia - Old City: Second Bank Portrait Gallery - Benjamin Franklin by wallyg.
(1706-1790)



12 टिप्‍पणियां:

  1. गज़ब का अनुवाद किया है……………एक कटु सत्य को बहुत ही सुन्दरता से उभारा है।

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  2. बहुत बहुत आभार आपका इस अनुवाद के लिए ! प्रणाम आपको !

    उत्तर देंहटाएं
  3. सार्थक सुन्दर अनुवाद...

    उत्तर देंहटाएं
  4. आप की सहायता से हम इतने महान लोगों को पढ़ पा रहे हैं...शुक्रिया !!

    उत्तर देंहटाएं
  5. अनुवाद एवं प्रस्‍तुति के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बेहतरीन कविता का बेहतरीन अनुवाद...अंतिम सत्य को बताती हुई ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. रचना बहुत ही शानदार है। रचना को पढ़कर बरबस भूपेन हजारिका की याद आ गई।
    उनका एक गीत है-
    उस दिन की बात है रमैय्या नाव लेकर सागर गया
    जाल बिछाने को... मछली पकड़ने को
    जइयो न रमैय्या जइयो न
    तूफान आएगा
    आज तो तड़के से
    बाई आंख फड़के रे
    आज कुछ हो जाएगा
    हो..ओ.. उस दिन की बात है
    रमैय्या नाव लेकर सागर गया


    कभी वक्त निकले तो भूपेन हजारिका की यह सीडी मैं और मेरा साया जरूर सुनिएगा
    मुझे लगता है आपको बहुत ही अच्छा लगेगा।
    आपको एक शानदार रचना के अनुवाद के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  8. फिर से चर्चा मंच पर, रविकर का उत्साह |

    साजे सुन्दर लिंक सब, बैठ ताकता राह ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच

    उत्तर देंहटाएं

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