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रविवार, 27 जून 2010

"कुछ आगे बढ़कर देखो तो!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

तुम मनको पढ़कर देखो तो!  
कुछ आगे बढ़कर देखो तो!! 


चन्दा है और चकोरी भी, 
रेशम की सुन्दर डोरी भी, 
सपनों में चढ़कर देखो तो- 
कुछ आगे बढ़कर देखो तो!! 


कुछ छन्द अधूरे से होंगे, 
अनुबन्ध अधूरे से होंगे, 
तुम आगे गढ़कर देखो तो! 
कुछ आगे बढ़कर देखो तो!! 


सागर से मोती चुन लेना, 
माला को फिर से बुन लेना, 
लहरों से लड़कर देखो तो! 
कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ छन्द अधूरे से होंगे,
    अनुबन्ध अधूरे से होंगे,
    तुम आगे गढ़कर देखो तो!
    कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ....प्रेरणादायक रचना

    उत्तर देंहटाएं
  2. प्रेरणादायी पंक्तियां।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति……………प्रेरक रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  4. कुछ छन्द अधूरे से होंगे,
    अनुबन्ध अधूरे से होंगे,
    तुम आगे गढ़कर देखो तो!
    कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!
    आस्था और आशावादिता से भरपूर स्वर इस कविता में मुखरित हुए हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सु8न्दर प्रेरक कविता है। आपकी कविताओं मे कुछ न कुछ सन्देश हमेशा छुपा रहता है। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  6. लहरों से लड़कर देखो तो!
    कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!
    आह्वान करती यह रचना बहुत खूबसूरत है

    उत्तर देंहटाएं
  7. सागर से मोती चुन लेना,
    माला को फिर से बुन लेना,
    लहरों से लड़कर देखो तो!
    कुछ आगे बढ़कर देखो तो!!

    बहुत खूब !!

    उत्तर देंहटाएं
  8. प्रेरणादायक रचना के लिए आपको बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर रचना ...अब तो आपका पेज इन्टरनेट एक्सप्लोरर में खुल रहा है , पहले मुश्किल देता था ....

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत ही खूबसूरत प्रेरणादायी पंक्तियाँ.

    उत्तर देंहटाएं

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