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सोमवार, 21 जून 2010

“काँटो की पहरेदारी में, ही गुलाब खिलते हैं” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)




आशा और निराशा के क्षण,
पग-पग पर मिलते हैं।

काँटों की पहरेदारी में,
ही गुलाब खिलते हैं।

पतझड़ और बसन्त कभी,
हरियाली आती है।
सर्दी-गर्मी सहने का,
सन्देश सिखाती है।
यश और अपयश साथ-साथ,
दायें-बाये चलते हैं।
काँटो की पहरेदारी में,
ही गुलाब खिलते हैं।

जीवन कभी कठोर कठिन,
और कभी सरल सा है।
भोजन अमृततुल्य कभी,
तो कभी गरल सा है।
सागर के खारे जल में,
ही मोती पलते हैं।
काँटो की पहरेदारी में,
ही गुलाब खिलते हैं।
 

23 टिप्‍पणियां:

  1. आपने आज इस रचना में हम सब का मार्गदर्शन किया है ! बेहद उम्दा | शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  2. आशा और निराशा के क्षण,
    पग-पग पर मिलते हैं।

    काँटों की पहरेदारी में,
    ही गुलाब खिलते हैं
    मंयक जी लाजवाब रचना है। आप छुट्टियाँ ब्लागिन्घ कर के मना रहे हैं? शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर सर..बढ़िया रचना ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह शास्त्री जी ..एक और कमाल की रचना

    उत्तर देंहटाएं
  5. मंगलवार 22- 06- 2010 को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है


    http://charchamanch.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खुब जी धन्यवाद इस सुंदर रचना के लिये

    उत्तर देंहटाएं
  7. काँटो की पहरेदारी में,
    ही गुलाब खिलते हैं।
    बहुत ही सुन्दर कविता है शास्त्री जी. सीख देती हुई. आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपने आज इस रचना में हम सब का मार्गदर्शन किया है ! बेहद उम्दा | शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  9. पथप्रदर्शक रचना ..
    बहुत सुन्दर लिखते हैं आप...
    मैं आज कल बहुत व्यस्त हो गयी हूँ इसलिए नहीं आ पाती हूँ...लेकिन ध्यान में हमेशा रहते हैं सभी लोग...
    आपका आभार...!

    उत्तर देंहटाएं
  10. अच्छा सन्देश देती सुंदर रचना के लिए बधाई स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह्………प्रेरक संदेश देती सार्थक रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  12. पतझड़ और बसन्त कभी,
    हरियाली आती है।
    सर्दी-गर्मी सहने का,
    सन्देश सिखाती है।

    प्रेरणा दायी रचना ! नया बिम्ब है 'काँटों के पहरेदारी में गुलाब का खिलना '

    उत्तर देंहटाएं
  13. आ गया है ब्लॉग संकलन का नया अवतार: हमारीवाणी.कॉम



    हिंदी ब्लॉग लिखने वाले लेखकों के लिए खुशखबरी!

    ब्लॉग जगत के लिए हमारीवाणी नाम से एकदम नया और अद्भुत ब्लॉग संकलक बनकर तैयार है। इस ब्लॉग संकलक के द्वारा हिंदी ब्लॉग लेखन को एक नई सोच के साथ प्रोत्साहित करने के योजना है। इसमें सबसे अहम् बात तो यह है की यह ब्लॉग लेखकों का अपना ब्लॉग संकलक होगा।

    अधिक पढने के लिए चटका लगाएँ:
    http://hamarivani.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  14. जीवन कभी कठोर कठिन,
    और कभी सरल सा है।
    भोजन अमृततुल्य कभी,
    तो कभी गरल सा है।
    सागर के खारे जल में,
    ही मोती पलते हैं।
    काँटो की पहरेदारी में,
    ही गुलाब खिलते हैं।.....बहुत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  15. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत सुन्दर सरल भाव से लिखी गई रचना बेहद पसंद आया !

    उत्तर देंहटाएं
  17. जीवन कभी कठोर कठिन,
    और कभी सरल सा है।
    भोजन अमृततुल्य कभी,
    तो कभी गरल सा है।
    सागर के खारे जल में,
    ही मोती पलते हैं।
    काँटो की पहरेदारी में,
    ही गुलाब खिलते हैं।......

    पूज्य शास्त्री जी ...सरस और गेय रचना!
    सादर प्रणाम !!

    उत्तर देंहटाएं
  18. कठिनाइयाँ ही विकसित होने का मौका देती हैं -और काँटे सुरक्षा - बहुत सार्थक कथन है !

    उत्तर देंहटाएं

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