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शुक्रवार, 11 जून 2010

“वो चमन चाहिए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

♥ एक पुराना गीत  ♥

मन-सुमन हों खिले, उर से उर हों मिले, 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए। 
ज्ञान-गंगा बहे, शन्ति और सुख रहे- 
मुस्कराता हुआ वो वतन चाहिए।। 

दीप आशाओं के हर कुटी में जलें, 
राम-लछमन से बालक, घरों में पलें, 
प्यार ही प्यार हो, प्रीत-मनुहार हो- 
देश में सब जगह अब अमन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।। 

छेनियों और हथौड़ों की झनकार हो, 
श्रम-श्रजन-स्नेह दें, ऐसे परिवार हों, 
खेत, उपवन सदा सींचती ही रहे- 
ऐसी दरिया-ए गंग-औ-जमुन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।। 

आदमी से न इनसानियत दूर हो, 
पुष्प, कलिका सुगन्धों से भरपूर हो, 
साज सुन्दर सजें, एकता से बजें, 
चेतना से भरे, मन-औ-तन चाहिए। 
लहलहाता हुआ वो चमन चाहिए।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. महत्वपूर्ण पोस्ट, साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. सच आज ऐसे ही चमन की दरकार है…………बहुत सुन्दर रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
    ढेर सारी शुभकामनायें.

    संजय कुमार
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. tabeeyat prasann ho gayi.......

    waah waah !

    pasand****************

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक सकारात्मक सोच देती हुई रचना .बहुत सुन्दर.

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच है ऐसा ही चमन चाहिए....पर स्नेह के सब दरख़्त काट रहे हैं और मन की धरती वीरान कर दी है....

    अत्यंत सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं

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