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शुक्रवार, 25 जून 2010

“इसे तो.. गांधी की सन्तान कहते हुए भी….” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

एक पादप साल का,
जिसका अस्तित्व
नही मिटा पाई, कभी भी,
समय की आंधी ।
ऐसा था, हमारा राष्ट्र-पिता,
महात्मा गान्धी ।।
कितना है कमजोर,
सेमल के पेड़ सा-
आज का नेता ।
जो किसी को,
कुछ नही देता ।।
दिया सलाई का-
नाज़ुक बक्सा,
सेंमल द्वारा निर्मित,
एक भवन ।
माचिस दिखाओ,
और कर लो हवन ।
आग ही तो लगानी है,
चाहे-
तन, मन, धन हो या वतन।।
यह बहुत मोटा, ताजा है,
परन्तु,
सूखे सालरूपी,
गांधी की तरह
बलिष्ट नही,
इसे तो
गांधी की सन्तान कहते हुए भी-
….....!

5 टिप्‍पणियां:

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