"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

मंगलवार, 15 जून 2010

‘‘आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

“25 साल पुरानी मेरी एक रचना”

आदमी के प्यार को, रोता रहा है आदमी।
आदमी के भार को, ढोता रहा है आदमी।।


आदमी का विश्व में, बाजार गन्दा हो रहा।
आदमी का आदमी के साथ, धन्धा हो रहा।।
 

आदमी ही आदमी का, भूलता इतिहास है।
आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।
 

आदमी पिटवा रहा है, आदमी लुटवा रहा।
आदमी को आदमी ही, आज है लुटवा रहा।।
 

आदमी बरसा रहा, बारूद की हैं गोलियाँ।
आदमी ही बोलता, शैतानियत की बोलियाँ।।
 

आदमी ही आदमी का,को आज है खाने लगा।
आदमी कितना घिनौना, कार्य अपनाने लगा।।
 

आदमी था शेर भी और आदमी बिल्ली बना।
आदमी अजमेर था और आदमी दिल्ली बना।।
 

आदमी था ठोस, किन्तु बर्फ की सिल्ली बना।
आदमी के सामने ही, आदमी खिल्ली बना।।
 

आदमी ही चोर है और आदमी मुँह-जोर है ।
आदमी पर आदमी का, हाय! कितना जोर है।।
 

आदमी आबाद था, अब आदमी बरबाद है।
आदमी के देश में, अब आदमी नाशाद है।।
 

आदमी की भीड़ में, खोया हुआ है आदमी।
आदमी की नीड़ में, सोया हुआ है आदमी।।
 

आदमी घायल हुआ है, आदमी की मार से।
आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha sir aadmi mar chuka...ab to uske bhi jeevashm khoje ja rahe honge....bahut sundar rachna

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक ही बात कहूंगा कि हर बात सच लिखी है....

    उत्तर देंहटाएं
  3. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. शास्त्री जी, आप आज भी कमाल का काव्य लिखते हैं और तब भी लाजवाब लिखते थे

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बढ़िया कविता शास्त्री जी बिल्कुल सही कहा आपने आज ला आदमी कुछ इसी तरह से होता जा रहा है..सुंदर कविता के लिए आभार..

    उत्तर देंहटाएं
  6. सच्चाई को कितनी सुन्दरता से शब्दों मे पिरोया है शास्त्री जी आपनें.

    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  7. २५ साल पहले कही गयी आज की सच्चाई ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  8. आदमी घायल हुआ है, आदमी की मार से।
    आदमी का अब जनाजा, जा रहा संसार से।।
    यही तो बिडम्बना है कि मार खाकर जिन्दा रहता है आदमी

    उत्तर देंहटाएं
  9. 25 saal pehle ki rachnaa bhi bilkul nayi jaisi lagti hai!
    bahut hee sundar guru ji!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत बढ़िया कविता शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  11. 25 साल पहले भी यही था और आज भी...एक कालजयी रचना है ...सुंदरता से अभिव्यक्त किया है

    उत्तर देंहटाएं
  12. कुछ सच हर काल मे अटल रहते हैं और ये उन मे से एक है……………बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  13. आदमी को आदमीयत का नही आभास है।।
    आदमी था ठोस, किन्तु बर्फ की सिल्ली बना।
    behtareen panktiyaan

    उत्तर देंहटाएं
  14. हिन्दी के गजलकार दुष्यंत की याद ताजा हो गई आपकी यह रचना पढ़कर। यूं ही लिखते रहे।

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails