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गुरुवार, 17 जून 2010

“कहीं सो न जाना!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सूचनाः- 17 जून से 19 जून तक 

लुधियाना में रहूँगा! 

21 जून को ही 

ब्लॉगिस्तान  में वापिस लौटूँगा! 

मेरे मोबाइल नम्बर हैं- 

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चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!

कलम के मुसाफिर, कहीं सो न  जाना!


जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग,
दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग,
तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!!
कलम के मुसाफिर...................!!


सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,
कलम में छिपी है ज़माने की ताकत,
भटके हुओं को सही पथ दिखाना!
कलम के मुसाफिर...................!!


झूठों की करना कभी मत हिमायत,
अमानत में करना कभी मत ख़यानत,
हकीकत से अपना न दामन बचाना!
कलम के मुसाफिर...................!!

11 टिप्‍पणियां:

  1. झूठों की करना कभी मत हिमायत,
    अमानत में करना कभी मत ख़यानत,
    हकीकत से अपना न दामन बचाना!
    कलम के मुसाफिर...................!!

    बहुत खूब... मगर हम तो सोने चले शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. झूठों की करना कभी मत हिमायत,
    अमानत में करना कभी मत ख़यानत,
    हकीकत से अपना न दामन बचाना!
    कलम के मुसाफिर...................!
    बहुत सुन्दर प्रेरक गीत बधाई ।अप तो लुधियाना जाने वाले थी शायद।

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रेरक कविता | अच्छी शिक्षा देती है |

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुन्‍दर शब्‍दों के साथ दिल को छूते भाव बेहतरीन ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह...प्रेरणादायक बहुत ही सुन्दर रचना....

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप की इस रचना को शुक्रवार, 18/6/2010 के चर्चा मंच पर सजाया गया है.

    http://charchamanch.blogspot.com

    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  7. चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!
    कलम के मुसाफिर, कहीं सो न जाना!

    जलाना पड़ेगा, तुम्हें दीप जगमग,
    दिखाना पड़ेगा, जग को सही मग,
    इस जग से बेरूख, कहीं हो न जाना!
    कलम के मुसाफिर..........!!


    सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,
    हार करके आखिर कलम फेंकना मत,
    देख हालत जहाँ की, कहीं रो न जाना!
    कलम के मुसाफिर..........!!

    झूठों की करना, कभी मत हिमायत,
    अमानत में करना, कभी मत ख़यानत,
    भूलके भी ऐसा बीज, कहीं बो न जाना!
    कलम के मुसाफिर............!!

    भाई जी,
    मेरी कोशिश देखें अच्छी लगी तो जरूर अपनाएं. धन्यबाद.

    उत्तर देंहटाएं
  8. comment from buzz...
    पद‍्म सिंह Padm Singh - मै यह निस्संदेह कहना चाहता हूँ कि पहले तो जिन भाई ने इसे संशोधित किया है ... तो अभी उन्हें रचना कर्म का कोई ज्ञान नहीं है ... अच्छी खासी रचना की ऐसी तैसी कर के डाल दी है ... अगर कुछ उन्हें गलत लग रहा था तो मूल रचनाकार से अनुरोध कर सकते थे ... ऐसा करना बेहूदगी से कम नहीं!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत खूबसूरत रचना | किसी की कविता से खेलना बहुत तुच्छ कार्य लगा |ऐसे लोगों का प्रयास हास्य प्रद है |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  10. भाई प्रेमनारायण शर्मा जी!
    माफ करना, बाहर गया था अभी लौटा हूँ!
    आपकी बात मुझे बिल्कुल भी पसन्द नही आई!
    यह तो सरासर अमानत में खयानत है!
    2-4 शब्द बदलने से यह आपकी रचना कैसे हो जायेगी?
    अब तो सन्देह भी होने लगा है कि आपने कहीं अपनी अन्य रचनाएँ भी इसी प्रकार तो नही लिखी हैं?
    मेरा सुझाव है कि लिखना हो तो मौलिक लिखो!
    मेरी रचना में क्यों हेर-फेर करते हो?

    उत्तर देंहटाएं

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