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शनिवार, 12 जून 2010

“जाना अपने घर, कल - परसो!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

♥ एक पुरानी रचना ♥


नभ में कितने घन-श्याम घिरे,
बरसी न अभी जी भर बदली।

मुस्कान सघन-घन दे न सके, 
मुरझाई आशाओं की कली।
------------
प्यासा चातक, प्यासी धरती,
प्यास लिए, अब फसल चली।
प्यासी निशा - दिवस प्यासे,
प्यासी हर सुबह-औ-शाम ढली। 

-------------
वन, बाग, तड़ाग, सुमन प्यासे,
प्यासी ऋषियों की वनस्थली।
खग, मृग, वानर, जलचर प्यासे,
प्यासी पर्वत की तपस्थली।

       ----------------
सूखा क्यों जलद तुम्हारा उर,
मानव मन की मनुहार सुनो।
इतने न बनो घनश्याम निठुर,
चातक की करुण पुकार सुनो।

      ----------------
फिर आओ गगन तले बादल,
अब तो मन-तन जी-भर बरसो।
विरहिन की ज्वाल, करो शीतल,
जाना अपने घर, कल - परसो।

16 टिप्‍पणियां:

  1. सूखा क्यों जलद तुम्हारा उर,
    मानव मन की मनुहार सुनो।
    इतने न बनो घनश्याम निठुर,
    चातक की करुण पुकार सुनो।
    Waah, Bahut sundar Shashtri ji.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सही अर्थों में बादलों को पुकारती रचना...बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  3. इतने न बनो घनश्याम निठुर,
    चातक की करुण पुकार सुनो।
    यह पुकार फलीभूत होगी ही. सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. जल बिन सब सूना है | बहुत सुंदर भाव लिए कविता
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  5. हमें भी इन्तजार है बादलों के बरसने का...

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूब ! बहुत सुन्दर रचना है !

    उत्तर देंहटाएं
  7. सूखा क्यों जलद तुम्हारा उर,
    मानव मन की मनुहार सुनो।
    इतने न बनो घनश्याम निठुर,
    चातक की करुण पुकार सुनो।

    बहुत ही सुन्दर भावभीनी रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  8. अभी अभी हमारे यहाँ बारिश हो रही है ...सुन्दर अभिव्यक्ति

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर लिखा है आपने! लाजवाब प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बारिश की चाह में लिखी रचना अच्‍छी है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत सुन्दर कविता..आनन्द आया.

    उत्तर देंहटाएं

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