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शुक्रवार, 17 फरवरी 2012

एक किरण अब भी बाकी है........ (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक')

पिछले कई वर्षों से मैं दो-मंजिले पर रहता हूँ। मेरे कमरे में तीन रोशनदान हैं। उनमें जंगली कबूतर रहने लगे थे। वहीं पर वो अण्डे भी देते थे, परन्तु कानिश पर जगह कम होने के कारण अण्डे नीचे गिर कर फूट जाते थे। मुझे यह अच्छा नही लगता था। 

एक दिन कुछ फर्नीचर बनवाने के लिए बढ़ई लगाया तो मुझे कबूतरों की याद आ गयी। मैंने बढ़ई से उनके लिए दो पेटी बनवा ली और किसी तरह से उनको रोशनदान में रखवा दिया।
अब कबूतर उसमें बैठने लगे। नया घर पाकर वो बहुत खुश लगते थे। धीरे-धीरे कबूतर-कबूतरी ने पेटी में तिनके जमा करने शुरू कर दिये। थोड़े दिन बाद कबूतरी ने इस नये घर में ही अण्डे दिये। कबूतर और कबूतरी बारी-बारी से बड़े मनोयोग से उन्हें सेने लगे।
एक दिन पेटी में से चीं-चीं की आवाज सुनाई देने लगी। अण्डों में से बच्चे निकल आये थे। अब कबूतर और कबूतरी उनको चुग्गा खिलाने लगे। धीरे-धीरे बच्चों के पर भी निकलने शुरू हो गये थे। एक दिन मैंने देखा कि कबूतरों के बच्चे उड़ने लगे थे। जैसे ही उनके पूरे पंख विकसित हो गये वे घोंसला छोड़ कर पेटी से उड़ गये ।
आज भी यह क्रम नियमित रूप से चल रहा है। कबूतर अण्डे देते हैं। अण्डों में से छोटे-छोटे बच्चे निकलते हैं और पंख आने के बाद उड़ जाते हैं। क्या संसार की यही नियति है? बालक जवान होते ही माता-पिता को ऐसे छोड़ कर चले जाते हैं जैसे कि कभी उनसे कोई नाता ही न रहा हो और माता-पिता देखते रह जाते हैं।
वे पुनः घोंसले में अण्डे देते हैं। उन्हें इस उम्मीद से सेते हैं कि इनमें से निकलने वाले बच्चे बड़े होकर हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेंगे।
शायद उनके मन में आशा की एक किरण अब भी बाकी है........

14 comments:

प्रवीण पाण्डेय 17 फरवरी 2012 9:57 pm  

आपने उन्हें घरौंदा देकर बहुत अच्छा कार्य किया है..

Roshi 17 फरवरी 2012 10:06 pm  

aapka pryas bahut hi sunder hai..............

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 17 फरवरी 2012 10:12 pm  

नेक कार्य के लिए बधाई , शाश्त्री जी !

vidya 17 फरवरी 2012 10:23 pm  

मेरे ख्याल में हम इंसान ही अपेक्षाएं/आशाएं पालते हैं बच्चों से..सभी से...
तभी मनुष्य इतना कुंठित होता है...और पंछी उन्मुक्त...

सादर...

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद 17 फरवरी 2012 10:37 pm  

तिनका तिनका जोड़ बनाया आशियाना
बडे हुए उड गए छोड आशियाना

sangita 17 फरवरी 2012 10:43 pm  

shabda hi nahin haen ki kaese aapka shukrana karun.

dheerendra 17 फरवरी 2012 11:23 pm  

इंसानों में पाने की अपेक्षाऐ ज्यादा होती है,पशु पंक्षियों में नही,....
बहुत अच्छी प्रस्तुति,

मनोज कुमार 18 फरवरी 2012 2:01 am  

स्थिति दर्दनाक है किंतु सच भी!

डॉ॰ मोनिका शर्मा 18 फरवरी 2012 6:38 am  

अनुकरणीय.....

ajit gupta 18 फरवरी 2012 9:42 am  

बस यही आकर इंसान मात खा जाता है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen 18 फरवरी 2012 10:07 am  

यही मोह है, या फिर प्रेम है या फिर नियति, या कुछ और कह लीजिए,

sushma 'आहुति' 18 फरवरी 2012 12:29 pm  

कोमल भावो की अभिवयक्ति......

वन्दना 18 फरवरी 2012 1:12 pm  

यही सत्य है।

Rakesh Kumar 18 फरवरी 2012 10:37 pm  

शास्त्री जी,आपके सद प्रयास को नमन.
काश पशु पक्षियों के लिए हम सब की संवेदनाएं
विकसित हो तो पर्यावरण का सामंजस्य बनाने
में आसानी होगी.उम्र की चतुर्थ अवस्था में
संन्यास ही एक मात्र साधन है.यानि आसक्ति
और दुराशा को छोड़ अपने आप में ही मग्न होना
और सुख दुःख को सहन करना.प्रकृति भी फिर
मदद करती है,

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