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बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

"अब भी हमारे गाँव में...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


इक पुराना पेड़ है अब भी है हमारे गाँव में।
चाक-ए-दामन सी रहा अब भी हमारे गाँव में।।

सभ्यता के ज़लज़लों से लड़ रहा है रात-दिन,
रंज-ओ-ग़म को पी रहा अब भी हमारे गाँव में।

मिल रही उसको तसल्ली देखकर परिवार को,
इसलिए ही जी रहा अब भी हमारे गाँव में।

जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।

रूप में ना नूर है, तेवर नहीं अब वो रहे,
थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में।

23 टिप्‍पणियां:

  1. जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
    हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
    bahut achcha sher likha prakarti humesha pyaar lutati rahti hai.bahut achchi ghazal.

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर रचना - "ओल्ड इज गोल्ड"

    उत्तर देंहटाएं
  3. “रूप” में ना नूर है, तेवर नहीं अब वो रहे,
    थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
    बहुत सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया,बेहतरीन अनुपम अच्छी प्रस्तुति,.....

    MY NEW POST...काव्यान्जलि...आज के नेता...

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुबह समीर जी की गजल पढ़ी और अब आप की.... आनंद ही आनंद...

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुबह समीर जी की गजल और अब आप की. आनंद आ गया..

    उत्तर देंहटाएं
  7. हमारे गाँव का पेंड...हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन जाता है...

    उत्तर देंहटाएं
  8. थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में।
    ..वाह!

    उत्तर देंहटाएं
  9. अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।

    तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।

    पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।

    उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।

    पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।

    पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।


    दिनेश की टिप्पणी - आपका लिंक
    http://dineshkidillagi.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  10. “रूप” में ना नूर है, तेवर नहीं अब वो रहे,
    थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में ………………बहुत सुन्दर भाव संजोये हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  11. जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
    हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।

    वाह ...बहुत ही बढिया।

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत खूब ... गाँव की बात ही क्या है ... हर किसी को यादों के जंगल में खींच ले जाता है ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. आपकी पोस्ट चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    http://charchamanch.blogspot.com
    चर्चा मंच-798:चर्चाकार-दिलबाग विर्क>

    उत्तर देंहटाएं
  14. आनंदित कर दिया..लगता है साक्षात वृक्ष बोल रहा है..
    हमारे शहर में भी सड़क निर्माण के लिए कई वृक्षों को ,जो वृद्ध थे घने थे ..काटा गया ..
    दिल निकलकर रह जाता है ..लगता है जैसे संपूर्ण मनुष्य का कत्ल किया गया है..
    kalamdaan.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  15. मिल रही उसको तसल्ली देखकर परिवार को,
    इसलिए ही जी रहा अब भी हमारे गाँव में।
    बहुत खूब!!

    उत्तर देंहटाएं
  16. पेड़ का मानवीकरण .अच्छी ग़ज़ल .रही बात रूप की सो नूर भी है तेवर भी रोज़ संवरते निखरते हैं .रूप भी है शाश्त्र भी परवाज़ भी आकाश भी .

    उत्तर देंहटाएं
  17. देखने की बात सब कौन क्या है देखता ,नूर तो बाकी अभी भी है हमारे गाँव में ....बढ़िया बहुत सुन्दर शास्त्री जी ....कृपया यहाँ भी पधारें -
    सोमवार, 27 अगस्त २०१२/
    ram ram bhai
    अतिशय रीढ़ वक्रता (Scoliosis) का भी समाधान है काइरोप्रेक्टिक चिकित्सा प्रणाली में
    http://veerubhai1947.blogspot.com/ उच्चारण -

    अपने अंतरजाल पर, इक पीपल का पेड़ ।
    तोता-मैना बाज से, पक्षी जाते छेड़ ।
    पक्षी जाते छेड़, बाज न फुदकी आती ।
    उल्लू कौआ हंस, पपीहा कोयल गाती ।
    पल-पल पीपल प्राण, वायु ना देता थमने ।
    पाले बकरी गाय, गधे भी नीचे अपने ।

    उत्तर देंहटाएं

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