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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

"टोपीदार दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


टोपी के दिन लद गये, पगड़ी सदाबहार।
जो पगड़ी को बाँधते, वो होते सरदार।१।

गांधी टोपी का कभी, भारत में था नाम।
गद्दारों ने कर दिया, अब इसको बदनाम।२।

मक्कारों ने हर लिया, जनता का आराम।
बगुलों ने टोपी लगा, जीना किया हराम।३।

खादी-टोपी ने किया, लोकतन्त्र में राज।
चिकनी-चुपड़ी बात से, बहका लिया समाज।४।

मत पाने के वास्ते, बोले मीठे बोल।
धर्म-जाति के गरल को, रहे देश में घोल।५।

17 टिप्‍पणियां:

  1. सत्य से रूबरू कराती शानदार प्रस्तुति !

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुक्रवारीय चर्चामंच पर है यह उत्कृष्ट प्रस्तुति |

    उत्तर देंहटाएं
  3. चाहे टोपी हो या पगड़ी...
    भरे बाजार उछल रही है...

    सार्थक रचना..
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह बहुत खूब ...टोपी सम्मान बना रहे

    उत्तर देंहटाएं
  5. कल 10/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर, सार्थक एवं सटीक अभिव्यक्ति....

    उत्तर देंहटाएं
  7. सच्चाई से रूबरू कराते बढ़िया दोहे.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर, सामयिक अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर सटीक प्रस्तुति। धन्यवाद।

    उत्तर देंहटाएं
  10. भारत की क्षितिज पर एक नया टोपी वाला आया है
    गाँधी टोपी बेचने वालों के दिलों में खौफ भर आया है...

    गाँधी टोपी कभी देश के आवाम की आवाज़ थी...गद्दारों ने इसे बदनाम कर दिया...खूबसूरत दोहे...

    उत्तर देंहटाएं
  11. वेष का ही महत्त्व है कि लुटेरे भी भगवा धारण करने पर पूजे जाते हैं.

    उत्तर देंहटाएं

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