"उच्चारण" 1996 से समाचारपत्र पंजीयक, भारत सरकार नई-दिल्ली द्वारा पंजीकृत है। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री को ब्लॉग स्वामी की अनुमति के बिना किसी भी रूप में प्रयोग करना© कॉपीराइट एक्ट का उलंघन माना जायेगा।

मित्रों!

आपको जानकर हर्ष होगा कि आप सभी काव्यमनीषियों के लिए छन्दविधा को सीखने और सिखाने के लिए हमने सृजन मंच ऑनलाइन का एक छोटा सा प्रयास किया है।

कृपया इस मंच में योगदान करने के लिएRoopchandrashastri@gmail.com पर मेल भेज कर कृतार्थ करें। रूप में आमन्त्रित कर दिया जायेगा। सादर...!

और हाँ..एक खुशखबरी और है...आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।

यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

"कुछ तराने नये मचलते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बेक़रारी के खाद-पानी से,
कुछ तराने नये मचलते हैं।

पत्थरों के जिगर को छलनी कर,
नीर-निर्झर नदी में ढलते हैं।।

आह पर वाह-वाह! करते हैं,
जब भी हम करवटें बदलते हैं।

वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
नग़मग़ी राग जब निकलते हैं।

दिल की लगी, दिल्लगी समझते हैं,
कब्र पर जब च़राग जलते हैं।

अपनी गर्दन झुका नहीं पाते,
रूप को देख हाथ मलते हैं।

17 टिप्‍पणियां:

  1. सार्थक,संवेदनशील भावनाओं का प्रतिनिधित्व करती कविता
    मनोरम है /

    उत्तर देंहटाएं
  2. पत्थरों के जिगर को छलनी कर,
    नीर-निर्झर नदी में ढलते हैं।।
    bahut sundar panktiya ...lajabaab

    उत्तर देंहटाएं
  3. दिल की लगी, दिल्लगी समझते हैं,
    कब्र पर जब च़राग जलते हैं।

    बहुत सुंदर
    क्या कहने

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या बात है....बहुत,बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,सुंदर रचना के लिए बधाई,.....

    MY NEW POST...आज के नेता...

    उत्तर देंहटाएं
  5. पत्थरों के जिगर को छलनी कर,
    नीर-निर्झर नदी में ढलते हैं।।
    sunder bhav ...

    उत्तर देंहटाएं
  6. वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
    नग़मग़ी राग जब निकलते हैं।

    अक्सर ऐसा ही होता है...

    उत्तर देंहटाएं
  7. दिल की लगी, दिल्लगी समझते हैं,
    कब्र पर जब च़राग जलते हैं।
    वाह वाह,,,

    उत्तर देंहटाएं
  8. दोहों से गजल तक सभी सधे हुए, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  9. वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
    नग़मग़ी राग जब निकलते हैं। बधाई,बेहतरीन अच्छी प्रस्तुति,

    उत्तर देंहटाएं
  10. आह पर वाह-वाह! करते हैं,
    जब भी हम करवटें बदलते हैं।

    वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
    नग़मग़ी राग जब निकलते हैं।

    वाह! सुन्दर रचना सर...
    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  11. बेक़रारी के खाद-पानी से,
    कुछ तराने नये मचलते हैं।
    बढ़िया मतला बढ़िया ग़ज़ल कुछ अलग हटके .

    उत्तर देंहटाएं
  12. bahut sunder bhavmai rachanaa .bahut badhaai aapko /
    आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली (३२) में शामिल किया गया है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आप सबका आशीर्वाद और स्नेह इस मंच को हमेशा मिलता रहे यही कामना है /आभार /इस मीट का लिंक है
    http://hbfint.blogspot.in/2012/02/32-gayatri-mantra.html

    उत्तर देंहटाएं

केवल संयत और शालीन टिप्पणी ही प्रकाशित की जा सकेंगी! यदि आपकी टिप्पणी प्रकाशित न हो तो निराश न हों। कुछ टिप्पणियाँ स्पैम भी हो जाती है, जिन्हें यथासम्भव प्रकाशित कर दिया जाता है।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails