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गुरुवार, 16 फ़रवरी 2012

"सबके मन को भाई रेल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 
धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।
 
इंजन चलता सबसे आगे।
पीछे -पीछे डिब्बे भागे।।

हार्न बजाता, धुआँ छोड़ता।
पटरी पर यह तेज दौड़ता।।
 
जब स्टेशन आ जाता है।
सिग्नल पर यह रुक जाता है।।

जब तक बत्ती लाल रहेगी।
इसकी जीरो चाल रहेगी।।

हरा रंग जब हो जाता है।
तब आगे को बढ़ जाता है।।
 
बच्चों को यह बहुत सुहाती।
नानी के घर तक ले जाती।।

सबके मन को भाई रेल।
आओ मिल कर खेलें खेल।।

धक्का-मुक्की रेलम-पेल।
आयी रेल-आयी रेल।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. बच्चों को यह बहुत सुहाती।
    नानी के घर तक ले जाती।।

    अच्छी पंक्तियाँ ...
    बहुत सुंदर बाल रचना,

    उत्तर देंहटाएं
  2. vaah kya rail chalaai hai aapne bachcho ko hi nahi badon ko bhi bahut pasand aai.

    उत्तर देंहटाएं
  3. ऐसे गीत पढ़कर बचपन फिर से जी लेता हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. तार से चलाए जाने वाले सिग्नल की फोटो बहुत अच्छी लगी और कविता तो है ही बढ़िया..

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपने तो हमारी विभागीय कविता लिख दी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सुंदर बाल कविता जो किसी पाठ्यक्रम में लगनी चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बचपन में पढ़ा था "छुक-छुक रेल ...."
    आज फिर से बचपन जग उठा !
    बहुत सुन्दर रचना !
    आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  8. अपने बचपन की याद आ गई जब एक दूसरे के कपडे को पकड कर रेल बनाकर चलते जाते थे ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बेहतरीन....
    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है।

    उत्तर देंहटाएं
  10. आप बाल मन को लुभाने में सक्षम हैं.
    युवा और बुड्ढों में भी बालपन का
    अहसास करवा देते हैं.
    बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं

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