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बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

"सात रंगों से सजने लगी है धरा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


धानी धरती ने पहना नया घाघरा।
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।।

पल्लवित हो रहा, पेड़-पौधों का तन,
हँस रहा है चमन, गा रहा है सुमन,
नूर ही नूर है, जंगलों में भरा।
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।।

देख मधुमास की यह बसन्ती छटा
शुक सुनाने लगे, अपना सुर चटपटा,
पंछियों को मिला है सुखद आसरा। 
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।। 

देश-परिवेश सारा महकने लगा,
टेसू अंगार बनकर दहकने लगा
सात रंगों से सजने लगी है धरा।
रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन सुंदर रचना,...

    MY NEW POST ...कामयाबी...

    उत्तर देंहटाएं
  3. नये नये श्रंगार धारण करती प्रकृति..

    उत्तर देंहटाएं
  4. aadarniy sir
    prakriti ke vividh rangon ko parilakxhit karti aapki post bahut bahut hi umda hai--------
    sadar naman
    poonam

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रकृती का सुंदर चित्रण...
    सुंदर रचना...:-)

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर! टेसू अंगार बनकर दहकने लगा,
    मुझे टेसू बेहद पसंद है.बहुत नौराई लगती है उसकी यहाँ शहर में.
    घुघूतीबासूती

    उत्तर देंहटाएं
  7. सात रंगों से सजने लगी है धरा।
    रूप कञ्चन कहीं है, कहीं है हरा।।

    लो फिर बसंत आया...

    उत्तर देंहटाएं

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