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बुधवार, 1 फरवरी 2012

"तन-मन का शृंगार करो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


देता है ऋतुराज निमन्त्रण,
तन-मन का शृंगार करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

नये पंख पक्षी पाते हैं,
नवपल्लव वृक्षों में आते,
आँगन-उपवन, तन और मन भी,
वासन्ती होकर मुस्काते,
स्नेह और श्रद्धा-आशा के
उर के मन्दिर में दीप धरो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

मन के हारे हार और
मन के जीते ही जीत यहाँ,
नजर उठा करके तो देखो,
बुला रही है प्रीत यहाँ,
उड़ने को उन्मुक्त गगन है,
पहले स्वयं विकार हरो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष के,
लिए मिला यह जीवन है,
मैल हटाओ, द्वेश मिटाओ,
निर्मल तन में निर्मल मन है,
दीन-दुखी को गले लगाओ,
दुर्बल से मत घृणा करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

29 comments:

वन्दना 1 फरवरी 2012 12:28 pm  

वाह बेहद खूबसूरत रचना ………आनन्दित कर दिया।

"रुनझुन" 1 फरवरी 2012 12:32 pm  

बसंती बयार सी झूमती गाती मधुर रचना...

ईं.प्रदीप कुमार साहनी 1 फरवरी 2012 1:46 pm  

बेहद सुन्दर रचना | मन आह्लादित हो उठा शास्त्री जी |
आभार |

prerna argal 1 फरवरी 2012 1:50 pm  

बहुत सुंदर रचना /बहुत सुंदर शब्दों में लिखी वसंत ऋतू पर लिखी मनभावन रचना /बधाई आपको /

dheerendra 1 फरवरी 2012 3:06 pm  

वाह....बहुत सुंदर मनभावन बासंती भाव लिए खुबशुरत रचना,....

निरामिष 1 फरवरी 2012 3:50 pm  

बहार स्वागत का सजीव चित्रण है।

धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष के,
लिए मिला यह जीवन है,
मैल हटाओ, द्वेश मिटाओ,
निर्मल तन में निर्मल मन है,
दीन-दुखी को गले लगाओ,
दुर्बल से मत घृणा करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

Kailash Sharma 1 फरवरी 2012 4:49 pm  

बहुत ख़ूबसूरत प्रस्तुति...

Maheshwari kaneri 1 फरवरी 2012 5:33 pm  

पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।......वहा: बहुत ही खूबसूरत रचना

vidya 1 फरवरी 2012 5:34 pm  

मन के हारे हार और
मन के जीते ही जीत यहाँ,
नजर उठा करके तो देखो,
बुला रही है प्रीत यहाँ,
उड़ने को उन्मुक्त गगन है,
पहले स्वयं विकार हरो।

....बहुत सुन्दर
सादर.

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') 1 फरवरी 2012 5:55 pm  

सुन्दर गीत सर...
सादर...

anju(anu) choudhary 1 फरवरी 2012 7:16 pm  

मन के हारे हार और
मन के जीते ही जीत यहाँ,
नजर उठा करके तो देखो,
बुला रही है प्रीत यहाँ,
उड़ने को उन्मुक्त गगन है,
पहले स्वयं विकार हरो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।.....

हर बार की तरह ...बेजोड ...बहुत खूब

***Punam*** 1 फरवरी 2012 8:50 pm  

धर्म-अर्थ और काम-मोक्ष के,
लिए मिला यह जीवन है,
मैल हटाओ, द्वेश मिटाओ,
निर्मल तन में निर्मल मन है,

लो फिर बसंत आई.....
सुन्दर रचना...

रजनी मल्होत्रा नैय्यर 1 फरवरी 2012 9:08 pm  

bahut khub sir.........basanti badhai sweekar karen..

मनोज कुमार 1 फरवरी 2012 9:15 pm  

वैचारिक ताजगी लिए हुए रचना विलक्षण है।

veerubhai 1 फरवरी 2012 10:17 pm  

सार्थक सकारात्मक रचना .जीवन के प्रति अनुराग और आदर से सिंचित .

भारतीय नागरिक - Indian Citizen 1 फरवरी 2012 11:40 pm  

बहुत सुन्दर सन्देश है..

Atul Shrivastava 2 फरवरी 2012 12:34 am  

उत्‍साह का संचार करती सुंदर रचना।

dheerendra 2 फरवरी 2012 2:14 am  

बेहतरीन रचना,लाजबाब प्रस्तुतीकरण..

NEW POST...40,वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-पर...

वाणी गीत 2 फरवरी 2012 6:49 am  

मैल हटाओ, द्वेश मिटाओ,
निर्मल तन में निर्मल मन है,
प्रेरक आह्वान !

Dp's Ranjan 2 फरवरी 2012 8:38 am  

ऋतुराज का बेहतरीन स्वागत.......:)

Rajesh Kumari 2 फरवरी 2012 10:25 am  

khoobsurat sandesh deti hui behtreen prastuti.rituraaj ka swagat hai.

smshindi By Sonu 2 फरवरी 2012 10:31 am  

बहुत सुंदर प्रस्तुति!
एक ब्लॉग सबका '

कुमार राधारमण 2 फरवरी 2012 11:17 am  

हां,सत्कर्म और आशावादिता में ही जीवन है।

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" 2 फरवरी 2012 11:20 am  

दीन-दुखी को गले लगाओ,
दुर्बल से मत घृणा करो।
पतझड़ की मारी बगिया में,
फिर से नवल निखार भरो।।

sundar shabd rachna

amrendra "amar" 2 फरवरी 2012 11:28 am  

वाह बेहद खूबसूरत रचना ………

कविता रावत 2 फरवरी 2012 6:53 pm  

Basant rang mein rangi sabko bhaichare ka mantra deti sundar prastuti hetu aabhar!

दिलबाग विर्क 2 फरवरी 2012 7:19 pm  

आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
कृपया पधारें
http://charchamanch.blogspot.in/2012/02/777.html
चर्चा मंच-777-:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

प्रवीण पाण्डेय 2 फरवरी 2012 8:00 pm  

एक नयापन भर जाने को,
जीवन जीभर मदमाने को..

Dr_JOGA SINGH KAIT "JOGI " 3 फरवरी 2012 1:28 pm  

तन-मन का शृंगार करो।वो चहरे पर झलकेगा

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