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रविवार, 12 फ़रवरी 2012

"मीठा-मीठा प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आलिंगन के दिवस पर, बुझा लीजिए प्यास।
दिन-प्रतिदिन बढ़ता रहे, आपस में विश्वास।१।

एक दिवस के लिए क्यों? चुम्बन का व्यापार।
जीवनभर करते रहो, मीठा-मीठा प्यार।२।

 अपनाओ निज सभ्यता, छोड़ विदेशी ढंग।
आलिंगन के साथ हो, जीवन भर का संग।३।

मानव मानव ही रहें, यही हमारा मन्त्र।
वासनाओं के लिए क्यों? ढोंग और षड़यन्त्र।४।

22 टिप्‍पणियां:

  1. स्नेह सिंचन में कोई बाधा नहीं .प्रकृत व जीव भी यही कहते हैं ..... रोचक दृश्य व रचना .. साधुवाद सर !

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह …………गज़ब की प्रस्तुति…………गागर मे सागर भर दिया।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मानव मानव ही रहें, यही हमारा मन्त्र।
    सुंदर और प्रेरक मंत्र

    उत्तर देंहटाएं
  4. अपनाओ निज सभ्यता, छोड़ विदेशी ढंग...
    सच कहते हैं आदरणीय शाश्त्री जी...
    सुन्दर रचना.
    सादर बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  5. जीवनभर करते रहो, मीठा-मीठा प्यार... बहुत सुन्दर..

    उत्तर देंहटाएं
  6. मानव मानव ही रहें, यही हमारा मन्त्र।
    वासनाओं के लिए क्यों? ढोंग और षड़यन्त्र।४
    बहुत सुंदर रचना .......

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुन्दर प्रस्तुति
    आपकी इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा कल दिनांक 13-02-2012 को सोमवारीय चर्चामंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह ||||
    सही बात कहा है आपने सर ....
    बहुत ही सुन्दर ....
    बेहतरीन रचना है....
    लाजवाब ....

    उत्तर देंहटाएं
  9. 'मानव मानव ही रहें, यही हमारा मन्त्र।
    वासनाओं के लिए क्यों? ढोंग और षड़यन्त्र'

    सरल शब्दों में सुन्दर रचना .

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  10. यह प्रस्तुत करने का आपका अलग और नया अंदाज है।

    उत्तर देंहटाएं
  11. bahut achcha likha aapne .bahut badhaai aapko.

    आपकी पोस्ट आज की ब्लोगर्स मीट वीकली का (३०) मैं शामिल की गई है /आप आइये और अपने विचारों से हमें अवगत करिए /आपका स्नेह और आशीर्वाद इस मंच को हमेशा मिलता रहे यही कामना है /आभार /लिंक है
    http://hbfint.blogspot.in/2012/02/30-sun-spirit.html

    उत्तर देंहटाएं

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