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शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2012

" प्रेमदिवस का रंग" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

जैसे-जैसे आ रहा, प्रेमदिवस नज़दीक।
वैसे-वैसे हो रहा, मौसम भी रमणीक।१।

चहक उठी है वाटिका, महक उठा है रूप।
भँवरे गुंजन कर रहे, खिली-खिली है धूप।२।

जोड़ों पर चढ़ने लगा, प्रेमदिवस का रंग।
रीत पुरानी है वही, मगर नये हैं ढंग।३।

कर्कश सुर में गा रहे, भौंडे-भौंडे गीत।।
नये साज के शोर में, बदल गया संगीत।४।

बरस रहा शृंगार है, सरस रहा मधुमास।
जड़-चेतन को हो रहा, मस्ती का आभास।५।

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत सुंदर और लयबद्ध रचना...

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं
  2. जोड़ों पर चढ़ने लगा, प्रेमदिवस का रंग।रीत पुरानी है वही, मगर नये हैं ढंग।३।

    कर्कश सुर में गा रहे, भौंडे-भौंडे गीत।।नये साज के शोर में, बदल गया संगीत।४।

    बहुत सुंदर,अच्छे फिट किये आपने !

    उत्तर देंहटाएं
  3. जोड़ों पर चढ़ने लगा, प्रेमदिवस का रंग।
    रीत पुरानी है वही, मगर नये हैं ढंग।३।
    सार्थक अर्थ पूर्ण व्यंग्य और विवरण दोनों समेटे हैं यह अप्रतिम दोहे शाष्त्री जी के .

    उत्तर देंहटाएं
  4. prem divas ka rang vaastav me chadhta ja raha hai.bahut sundar laybadh geet likha hai aapne.

    उत्तर देंहटाएं
  5. नए ढंग पर पुराना रंग ... अच्छा व्यंग है .. सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  6. आजकल का चलन ..
    पहले कहाँ होते थे ये सब..
    kalamdaan.blogspot.in

    उत्तर देंहटाएं
  7. यहाँ तो इस बार बर्फ के फूल गिर रहे हैं प्रेम दिवस पर.
    सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  8. तो नीली चड्डी और गुलाबी चड्डि के टकराव का मौसम आ गया!!!!!!

    उत्तर देंहटाएं
  9. प्रेमदिवस पर प्रेम से व्यंग ....

    उत्तर देंहटाएं
  10. क्या सुन्दर चित्र का चयन किया है इस सुन्दर रचना के लिए ... व्यंग भी बड़ी नाजुक अंदाज में ..

    उत्तर देंहटाएं

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