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बुधवार, 29 फ़रवरी 2012

"बुड्ढों को पाँव जमाना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ए-के सैंतालीस, अस्त्र-शस्त्र, बेकार सभी हो जायेंगे।
अणु और परमाणु-बम भी, सफल नही हो पायेंगे।।

सागर में डुबो फेंक दो अब, तलवार तोप और भालों को।
सेना में भर्ती कर लो, कुछ खादी वर्दी वालों को।।

शासन से कह दो अब, करना सेना का निर्माण नही।
छाँट-छाँट कर वीर-सजीले, भरती करना ज्वान नही।।

फौजों का निर्माण, शान्त उपवन में आग लगा देगा।
उज्जवल धवल पताका में, यह काला दाग लगा देगा।

नही चाहिए युद्ध-भूमि में, कुछ भी सैन्य सामान हमें।
युद्ध-क्षेत्र में, कर्म-क्षेत्र में, करना है आराम हमें।।

शत्रु नही भयभीत कदापि, तोप, टैंक और गोलों से।
इनको भय लगता है केवल, नेताओं के बोलों से।।

रण-भूमि में कुछ कारीगर, मंच बनाने वाले हों।
लाउड-स्पीकर शत्रु के दिल को दहलाने वाले हों।।

सजे-धजे अब युद्ध-मंच पर, नेता अस्त्र-शस्त्र होंगे।
सिर पर शान्ति-ध्वजा टोपी, खादी के धवल-वस्त्र होंगे।

गोलों की गति से जब नेता, भाषण ज्वाला उगलेंगे।
तरस बुढ़ापे पर खाकर, शत्रु के दिल भी पिघलेंगे।।

मोतिया-बिन्द वाली आँखों से, वैरी नही बच पायेगा।
भारी-भरकम भाषण से ही, जीते-जी मर जायेगा।।

सेना में इन वृद्धजनों को, निज जौहर दिखलाना है।
युवकों के दिन बीत गये, बुड्ढों को पाँव जमाना है।।

मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

"निर्वाचन का दौर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


भारत की महानता का, नही है अतीत याद,
वोट माँगने को, नेता आया बिनबुलाया है।
देश का कहाँ है ध्यान, होता नित्य सुरापान,
जाति, धर्म, प्रान्त जैसे, मुद्दों को भुनाया है।
युवराज-सन्त चल पड़े, गली-हाट में,
निर्वाचन के दौर ने, ये दिन भी दिखाया है।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

"मुझको दर्पण दिखलाया क्यों?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मेरे वैरागी उपवन में,
सुन्दर सा सुमन सजाया क्यों?

सूने-सूने से मधुबन में,
गुल को इतना महकाया क्यों?

मधुमास बन गया था पतझड़,
संसार बन गया था बीहड़,
दण्डक-वन से, इस जीवन में,
शीतल सा पवन बहाया क्यों?

दिन-रैन चैन नही आता था,
मुझको एकान्त सुहाता था,
चुपके से आकर नयनों में,
सपनों का भवन बनाया क्यों?

नही हँसता था, नही रोता था,
नही अन्तर्मन को धोता था,
चुपके से आकर आँगन में,
मुझको दर्पण दिखलाया क्यों?

स्वर नहीं सजाना आता था,
ना साज बजाना आता था,
चुपके से कानों में आकर,
सुन्दर संगीत सुनाया क्यों?

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

"होली लेकर, फागुन आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


गली-गाँव में धूम मची है,
फागों और फुहारों की।।
मन में रंग-तरंग सजी है,
होली के हुलियारों की।।

गेहूँ पर छा गयीं बालियाँ,
नूतन रंग में रंगीं डालियाँ,
गूँज सुनाई देती अब भी,
बम-भोले के नारों की।।

पवन बसन्ती मन-भावन है,
मुदित हो रहा सबका मन है,
चहल-पहल फिर से लौटी है,
घर - आँगन, बाजारों की।।
जंगल की चूनर धानी है,
कोयल की मीठी बानी है,
परिवेशों में सुन्दरता है,
दुल्हिन के श्रृंगारों की।।
होली लेकर, फागुन आया,
मीठी-हँसी, ठिठोली लाया,
सावन जैसी झड़ी लगी है,
प्रेम-प्रीत, मनुहारों की।।

गली-गाँव में, धूम मची है,
फागों और फुहारों की।।
मन में रंग-तरंग सजी है,
होली के हुलियारों की।।

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

"होली आई है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
तीन दिनों के लिए बाहर जा रहा हूँ!
 मैंने रचनाओं को शैड्यूल कर दिया है,
जो रोज प्रकाशित होती रहेंगी!
खुशियों की सौगात लिए होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

रंग-बिरंगी पिचकारी ले,
बच्चे होली खेल रहे हैं।
मम्मी-पापा दोनों मिल कर,
मठरी-गुझिया बेल रहे हैं।
पकवानों को साथ लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

जाड़ा भागा, गरमी आई,
होली यह सन्देशा लाई।
कोयल बोल रही बागों में,
कौए ने पाँखे खुजलाई।
ठण्डी कुल्फी हाथ लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

सरसों फूली, टेसू फूले,
आम-नीम बौराये हैं।
मक्खी, मच्छर भी होली का,
गीत सुनाने आये हैं।
साथ चाँदनी रात लिए, होली आई है।
रंगों की बरसात लिए, होली आई है।।

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

"कुछ तराने नये मचलते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बेक़रारी के खाद-पानी से,
कुछ तराने नये मचलते हैं।

पत्थरों के जिगर को छलनी कर,
नीर-निर्झर नदी में ढलते हैं।।

आह पर वाह-वाह! करते हैं,
जब भी हम करवटें बदलते हैं।

वो समझते हैं पीड़ को मस्ती,
नग़मग़ी राग जब निकलते हैं।

दिल की लगी, दिल्लगी समझते हैं,
कब्र पर जब च़राग जलते हैं।

अपनी गर्दन झुका नहीं पाते,
रूप को देख हाथ मलते हैं।

"आ जाएगा जीने का ढंग!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
जब
भावनाओं का
ज्वार बढ़ जाता है
तब
बुद्धि मन्द हो जाती है
लाचारगी
और बेचारगी
का साया
मन पर
अधिकार कर लेता है
निश्चय और अनिश्चय में
झूलने लगता है
मन प्राण और देह
आते रहते हैं
नकारात्मक भाव
लेकिन
कुछ समय बाद
ज्वार निकल जाता है
सोच बदलने लगती है
तो
बुद्धि भी काम करने लगती है
और
हो जाता है
समस्याओं का हल
खिल जाता है
मन का कमल
मिल जाता है
आशातीत परिणाम
विषम परिस्थियों में
धैर्य और विवेक
रखना होगा अपने संग
तो खुद-ब-खुद
आ जाएगा जीने का ढंग!!

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

"अब भी हमारे गाँव में...." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


इक पुराना पेड़ है अब भी है हमारे गाँव में।
चाक-ए-दामन सी रहा अब भी हमारे गाँव में।।

सभ्यता के ज़लज़लों से लड़ रहा है रात-दिन,
रंज-ओ-ग़म को पी रहा अब भी हमारे गाँव में।

मिल रही उसको तसल्ली देखकर परिवार को,
इसलिए ही जी रहा अब भी हमारे गाँव में।

जानता है ज़िन्दगी की हो रही अब साँझ है,
हाड़ अपने धुन रहा अब भी हमारे गाँव में।

रूप में ना नूर है, तेवर नहीं अब वो रहे,
थान मखमल बुन रहा अब भी हमारे गाँव में।

मंगलवार, 21 फ़रवरी 2012

"आदरणीय “रविकर” जी को समर्पित-पाँच दोहे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आदरणीय रविकर जी ने
मेरे चित्र पर दो टिप्पणियाँ की थी!
रविकर Feb 21, 2012 04:16 AM
गेहूं जामे गजल सा,
सरसों जैसे छंद |
जामे में सोहे भला,
सूट ये कालर बंद ||
प्रत्‍युत्तर दें
उत्तर
रविकर Feb 21, 2012 04:19 AM
सुटवा कालर बंद ||
उसी के उत्तर में पाँच दोहे
आदरणीय रविकर जी को
समर्पित कर रहा हूँ!
-0-0-0-0-0-
रविकर जी को भा रहा, अब भी मेरा रूप
वृद्धावस्था में कहाँ, यौवन जैसी धूप।१।

गेहूँ उगता ग़ज़ल सा, सरसों करे किलोल।
बन्द गले के सूट में, ढकी ढोल की पोल।२।

मौसम आकर्षित करे, हमको अपनी ओर।
कनकइया डग-मग करे, होकर भावविभोर।३।

कड़क नहीं माँझा रहा, नाज़ुक सी है डोर।
पतंग उड़ाने को चला, बिन बाँधे ही छोर।४।

पत्रक जब पीला हुआ, हरियाली नहीं पाय।
ना जाने कब डाल से, पका पान झड़ जाय।५।

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