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बुधवार, 22 सितंबर 2010

"घिर-घिर बादल आये रे..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गीत : मेरा
स्वर : अर्चना चावजी का



चौमासे में आसमान में,
घिर-घिर बादल आये रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

उनके लिए सुखद चौमासा,
पास बसे जिनके प्रियतम,
कुण्ठित है उनकी अभिलाषा,
दूर बसे जिनके साजन ,
वैरिन बदली खारे जल को,
नयनों से बरसाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

पुरवा की जब पड़ीं फुहारें,
ताप धरा का बहुत बढ़ा,
मस्त हवाओं के आने से ,
मन का पारा बहुत चढ़ा,
नील-गगन के इन्द्रधनुष भी,
मन को नहीं सुहाए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

जिनके घर पक्के-पक्के हैं,
बारिश उनका ताप हरे,
जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं,
उनके आँगन पंक भरे,
कंगाली में आटा गीला,
हर-पल भूख सताए रे!
श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
मन में आग लगाए रे!!

23 टिप्‍पणियां:

  1. पुरवा की जब पड़ीं फुहारें,
    ताप धरा का बहुत बढ़ा,
    मस्त हवाओं के आने से ,
    मन का पारा बहुत चढ़ा..
    बहुत ख़ूबसूरत और मनमोहक गीत! अर्चना जी की मधुर आवाज़ में सुनकर बहुत अच्छा लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  2. अति सुन्दर रचना
    अच्छी पंक्तिया ........

    यहाँ भी आये एवं कुछ कहे :-
    समझे गायत्री मन्त्र का सही अर्थ

    उत्तर देंहटाएं
  3. मधुर आवाज ने आप के गीत मै जान डाल दी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर गीत रचा है मयंक जी ...

    उत्तर देंहटाएं
  5. मन में लगी आग लेखन और गायन में इतनी मधुरता से व्यक्त होगी, इसकी कल्पना भी नहीं थी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद मधुर और शानदार रचना. जिन्दगी के सच के साथ....

    उत्तर देंहटाएं
  8. जिनके घर पक्के-पक्के हैं,
    बारिश उनका ताप हरे,
    जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं,
    उनके आँगन पंक भरे,
    कंगाली में आटा गीला,
    हर-पल भूख सताए रे!
    श्याम-घटाएँ विरहनिया के,
    मन में आग लगाए रे!!

    सम-सामयिक रचना शास्त्री जी ! मुझे अपने एक जानकार से पता चला की इस बार इन मेघों ने उत्तराखंड में तवाही मचा रखी है !

    उत्तर देंहटाएं
  9. मधुर आवाज़ के साथ शानदार गीत्।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जिनके घर पक्के-पक्के हैं,
    बारिश उनका ताप हरे,
    जिनके घर कच्चे-कच्चे हैं,
    उनके आँगन पंक भरे,

    सुन्‍दर शब्‍द रचना ।

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुन्दर गीत

    मयंक अंकल

    वैसे किसी काम को शुरू करने से पहले बडों का आशीर्वाद लेना जरूरी होता है ,मेरी शिक्षासुरु हो गयी है तो आप के आशीर्वाद का इच्छुक हूँ , जैसे आपके पीछे माता सरस्वती बसती है वैसे ही मुझे भी आशीर्वाद दे की मेरे ऊपर भी माँ सरस्वती का आशीर्वाद बना रहे

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ह‍ी अच्‍छी रचना, बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  13. आभार....चाचाजी, जो इस गीत को गाने का मौका दिया|
    आभार श्रोताओं का पसंद करने के लिए |

    उत्तर देंहटाएं
  14. कविता भाषा शिल्‍प और भंगिमा के स्‍तर पर समय के प्रवाह में मनुष्‍य की नियति को संवेदना के समांतर, दार्शनिक धरातल पर अनुभव करती और तोलती है ।
    मस्त हवाओं के आने से ,
    मन का पारा बहुत चढ़ा,
    नील-गगन के इन्द्रधनुष भी,
    मन को नहीं सुहाए रे!

    उत्तर देंहटाएं

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