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रविवार, 26 सितंबर 2010

"नारी की व्यथा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मैं धरती माँ की बेटी हूँ
इसीलिए तो
सीता जैसी हूँ
मैं हूँ
कान्हा के अधरों से
गाने वाली मुरलिया,
इसीलिए तो
गीता जैसी हूँ।

मैं
मन्दालसा हूँ,
जीजाबाई हूँ
मैं
पन्ना हूँ,
मीराबाई हूँ।

जी हाँ
मैं नारी हूँ,
राख में दबी हुई
चिंगारी हूँ।

मैं पुत्री हूँ,
मैं पत्नी हूँ,
किसी की जननी हूँ
किसी की भगिनी हूँ।

किन्तु
आज लोगों की सोच
कितनी गिर गई है,
मानवता
कितनी मर गई है।

दुनिया ने मुझे
मात्र अबला मान लिया है,
और केवल
भोग-विलास की
वस्तु जान लिया है!

यही तो है मेरी कहानी,
आँचल में है दूध
और आँखों में पानी!

(आँचल में है दूध
और आँखों में पानी! ये पंक्तियाँ
राष्ट्र कवि मैंथिली शरण गुप्त जी की हैं)

22 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो है मेरी कहानी,
    आँचल में है दूध
    और आँखों में पानी!

    बहुत ही सुंदर रचना.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  2. बेहद खूबसूरती से एक नारी की व्यथा को चित्रित किया है……………न जाने कब परिवर्तन होगा। बेहद मार्मिक अभिव्यक्ति।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत खूबसूरती से नारी दशा को दर्शाया है.
    मार्मिक रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  4. कभी बेबसी, कभी लाचारी हूँ
    कभी छुईमुई, कभी कटारी हूँ
    मैं नारी हूँ, कुदरत की बनाई-
    बड़ी अजब पिटारी हूँ....

    उत्तर देंहटाएं
  5. घरों में रीढ़ बन सबको समेटने वाली अबला नहीं हो सकती।

    उत्तर देंहटाएं
  6. आपने बड़े ही सुन्दरता से नारी की व्यथा को प्रस्तुत किया है! मार्मिक रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेहद उम्दा रचना ! बधाइयाँ और शुभकामनाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. एक मार्मिक और भावपूर्ण रचना..सुंदर रचना के लिए बधाई शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  9. नारी अब ऐसी भी है , वैसी भी
    कोमल भी तो शक्ति भी
    अबला तो सबला भी ....
    और कभी -कभी बला भी ......:)

    उत्तर देंहटाएं
  10. "कोमल हैं कमजोर नहीं
    शक्ति का नाम ही नारी हैं
    जग को जीवन देने वाली
    मौत भी तुझ से हारी हैं "

    "नारी को इस देश ने
    देवी कह कर दासी जाना हैं
    जिस को कोई अधिकार ना हों
    वो घर की रानी माना हैं "

    आप की कविता की आखरी लाइने आप की नहीं हैं ये मैथिलीशरण गुप्त जी की पंक्तियाँ हैं कम से कम आप उनका नाम प्रेरित मे ही दे देते

    उत्तर देंहटाएं
  11. रचना जी!
    आपका आभार!
    --
    "आँचल में है दूधऔर आँखों में पानी"
    राष्ट्र कवि स्व. मैथिलीशरण गुप्त जी की ये पंक्तियाँ तो सभी को याद हैं!
    --
    अब क्षमा भी माँग ली है और सुधार भी कर लिया है!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत ही भावपूर्ण रचना है........बेहद खुबसूरत!

    उत्तर देंहटाएं
  13. नारी की व्यथा को आपने सार्थक रूप में प्रस्तुत किया है, ऐसा ही एक
    छोटा सा प्रयास
    यहाँ पर भी है। समय मिले, तो अवश्य देखें।

    उत्तर देंहटाएं
  14. bahut khoob.abla jeevan hai tumhari yahi kahani aanchal me hai doodh aankho me hai paani...kaviraj maithili sharangupt ji ki in lino ko kis khoobsurti se abhivyakt kiya hai aapne.

    उत्तर देंहटाएं
  15. लेकिन अब आम्चल में दूध और आँखों में पानी नही है ,नारी अब सिर्फ अबला जीवन नही है ।

    उत्तर देंहटाएं
  16. कल 14/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं
  17. सबसे पहले हिंदी दिवस की शुभकामनायें/नारी की ब्यथा को उजागर करती हुई शानदार रचना बहुत बधाई आपको /मेरी नई पोस्ट हिंदी दिवस पर लिखी पर आपका स्वागत है /

    उत्तर देंहटाएं

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