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गुरुवार, 16 सितंबर 2010

“मैं कोई भगवान नहीं हूँ।” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


“वन्दना”


मुझको सरिता में बहने दो,
कंकड़ हूँ पाषाण नहीं हूँ।
मुझको व्यक्ति मात्र रहने दो,
मैं कोई भगवान नही हूँ।।

कृपा पुंज हो, कृपा करो तुम,
पाप जगत के अपा करो तुम,
मुझको नश्वर ही रहने दो,
निराकार बलवान नहीं हूँ। 
मैं कोई भगवान नही हूँ।।

मैं पूजा का पात्र नहीं हूँ,
संदीपनि का छात्र नहीं हूँ,
मुझको साधारण रहने दो,
मैं कोई विद्वान नही हूँ।
मैं कोई भगवान नही हूँ।।

तुच्छ बून्द मैं, तुम हो सागर,
जिसमें है अमृत की गागर,
मुझको सीमा में रहने दो,
मैं रत्नेश महान नहीं हूँ।
मैं कोई भगवान नही हूँ।।

तुम हो पूज्य, पुजारी मैं हूँ,
तुम अरण्य वनचारी मैं हूँ,
मुझको याचक ही रहने दो,
मैं दाता धनवान नहीं हूँ।
मैं कोई भगवान नही हूँ।।

25 टिप्‍पणियां:

  1. मयंक जी ,महान व्यक्तियों कि यही पहचान होती है सुंदर रचना बधाई

    उत्तर देंहटाएं
  2. इंसान - इंसान ही बन जाये बहुत है ..
    बहुत सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  3. मैं पूजा का पात्र नहीं हूँ,
    संदीपनि का छात्र नहीं हूँ,
    मुझको साधारण रहने दो,
    मैं कोई विद्वान नही हूँ।
    मैं कोई भगवान नही हूँ।।

    Bahut sundar shashtri ji

    उत्तर देंहटाएं
  4. लोगों को जागरूक करती रचना। आपकी कविता में प्रस्तुत विचार अनुकरणीय है एक शे’र कहने का दिल कर गया।

    बस मौला ज्‍यादा नहीं, कर इतनी औकात,
    सर उँचा कर कह सकूं, मैं मानुष की जात
    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

    अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

    उत्तर देंहटाएं
  5. मेरे पास शब्द खत्म हो जाते हैं रचना की प्रशंसा करने के लिये...

    उत्तर देंहटाएं
  6. आप की रचना 17 सितम्बर, शुक्रवार के चर्चा मंच के लिए ली जा रही है, कृप्या नीचे दिए लिंक पर आ कर अपनी टिप्पणियाँ और सुझाव देकर हमें अनुगृहीत करें.
    http://charchamanch.blogspot.com


    आभार

    अनामिका

    उत्तर देंहटाएं
  7. गीत विधा का समूचा सौन्दर्य आपकी रचनाओं में सदैव मिलता है...........आज भी मिला ..धन्यवाद !

    उत्तर देंहटाएं
  8. तुच्छ बून्द मैं, तुम हो सागर,
    जिसमें है अमृत की गागर,
    मुझको सीमा में रहने दो,
    मैं रत्नेश महान नहीं हूँ।
    मैं कोई भगवान नही हूँ।।
    Bahut sundar bhakti ras se bari rachana...aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  9. इंसान के लिए इंसान बने रहना ही ठीक है ...
    सुंदर रचना..!

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय मयंकजी ! सबसे पहले तो एक बहुत ही भक्तिभाव पूर्ण रचना के लिए मेरी हार्दिक बधाई . लेकिन रचना के ऊपर दिए गए गायत्री मंत्र का सन्दर्भ रचना की भावनाओं से मेल नहीं खाता . मेरा एक ब्लॉग है वेद-सार , जिसमे मैं यदा कदा वेद मन्त्रों का अर्थ तथा गद्यात्मक भावार्थ लिखता रहता हूँ . इस लिंक के माध्यम से आप मेरे गायत्री मंत्र के पन्ने तक पहुँच सकते हैं .

    http://mahendra-arya2.blogspot.com/2010/08/blog-post_12.html

    क्षमा चाहता हूँ , मेरा उद्देश्य आपकी इस खूबसूरत रचना को अपने ही कलेवर में सराहने का है .

    उत्तर देंहटाएं
  11. आज की आपकी रचना ने तो दिल मोह लिया……………।बहुत बहुत बहुत ही सुन्दर ………………एक प्रार्थना है जो दिल मे उतरती है। यही तो आपकी खूबी है।

    उत्तर देंहटाएं
  12. वाह! बहुत ही बेहतरीन रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  13. अज जब हर आदमी भगवान बनना चाहता है वहाँ आपकी ये याचना सब के लिये प्रेरना है। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  14. सभी को सच्चा इंसान बनने के लिए प्रेरित करती भावपूर्ण रचना । आभार! -: VISIT MY BLOG :- जिसको तुम अपना कहते होँ.........कविता को पढ़ने के लिए आप सादर आमंत्रित हैं

    उत्तर देंहटाएं
  15. प्रेरणा देती हुए अत्यंत सुन्दर रचना लिखा है आपने ! आपकी लेखनी को सलाम!

    उत्तर देंहटाएं
  16. बहुत बढ़िया कोशिश है यह.

    हमारीवाणी को और भी अधिक सुविधाजनक और सुचारू बनाने के लिए प्रोग्रामिंग कार्य चल रहा है, जिस कारण आपको कुछ असुविधा हो सकती है। जैसे ही प्रोग्रामिंग कार्य पूरा होगा आपको हमारीवाणी की और से हिंदी और हिंदी ब्लॉगर के साथ-साथ अन्य भारतीय भाषाओँ और भारतीय ब्लागर के लिए ढेरों रोचक सुविधाएँ और ब्लॉग्गिंग को प्रोत्साहन के लिए प्रोग्राम नज़र आएँगे। अगर आपको हमारीवाणी.कॉम को प्रयोग करने में असुविधा हो रही हो अथवा आपका कोई सुझाव हो तो आप "हमसे संपर्क करें" पर चटका (click) लगा कर हमसे संपर्क कर सकते हैं।

    टीम हमारीवाणी


    हमारीवाणी पर ब्लॉग पंजीकृत करने की विधि

    उत्तर देंहटाएं
  17. सच है ! आज विश्व के मंदिर में भगवन नहीं इंसान चाहिए ...
    सुन्दर सारगर्भित रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  18. कृपा पुंज हो, कृपा करो तुम,
    पाप जगत के अपा करो तुम,
    मुझको नश्वर ही रहने दो,
    निराकार बलवान नहीं हूँ।
    मैं कोई भगवान नही हूँ।।

    -----
    बहुत सुन्दर लिखा है अपने मयंक जी बहुत मीठा

    उत्तर देंहटाएं

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