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रविवार, 19 सितंबर 2010

“आसमान के आँसू” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

आषाढ़ से आकाश अब तक रो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

आज पानी बन गया जंजाल है,

भूख से पंछी हुए बेहाल हैं,

रश्मियों को सूर्य अपनी खो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

कब तलक नौका चलाएँ मेह में,

भर गया पानी गली और गेह में,

इन्द्र जल-कल खोल बेसुध सो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

बिन चुगे दाना गगन में उड़ चले,

घोंसलों की ओर पंछी मुड़ चले,

दिन-दुपहरी दिवस तम को ढो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

धान खेतों में लरजकर पक गया है,

घन गरजकर और बरसकर थक गया है,

किन्तु क्यों नगराज छागल  ढो रहा है?

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है? 

देखकर अतिवृष्टि क्यों हैरान इतना हो रहा,

पुण्य सलिला में निरन्तर पाप अपने धो रहा,  

उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है।

बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?  

28 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर भावपूर्ण रचना के लिए बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सशक्त कविता. सच्चे सीधे भाव.गंभीर विषय. सच कह रहें हैं आप "बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाएं "

    उत्तर देंहटाएं
  3. देखकर अतिवृष्टि क्यों हैरान इतना हो रहा,
    पुण्य सलिला में निरन्तर पाप अपने धो रहा,
    उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है।
    बादलों को इस बरस क्या हो रहा है?

    बहुत सुंदर कविता...आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आई, अच्छा लगा....

    उत्तर देंहटाएं
  4. सही कहा शास्त्री जी, यहां भी आज इन्द्र देव कौमन वेल्थ पर रात से ही रो रहे है लगातार !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना! बहुत बढ़िया लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  6. उग रही वैसी फसल जैसी धरा में बो रहा है

    सही कहा ...प्रकृति स्वयं ही संतुलन करती है लेकिन विपदाएं तो आही जाती हैं ...

    सुन्दर अभिव्यक्ति ..गंभीर चिंतन

    उत्तर देंहटाएं
  7. भई वाह बहुत बढ़िया लिखा है .... साथ में चित्र भी बढ़िया है ...

    इसे भी पढ़कर कुछ कहे :-
    आपने भी कभी तो जीवन में बनाये होंगे नियम ??

    उत्तर देंहटाएं
  8. अतिवृष्टि और अनावृष्टि दोनों ही स्थितियां भयावह होती हैं....
    सुन्दर रचना है....
    regards,

    उत्तर देंहटाएं
  9. शास्त्री जी की लेखनी चलेगी तो कोई उत्तम कविता की सृजना ही होगी.........

    धन्य हो !

    उत्तर देंहटाएं
  10. अति तो किसी भी चीज की ठीक नहीं होती। चाहे अमृत ही क्यों ना हो।

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत ही खूबसूरत कविता है......

    उत्तर देंहटाएं
  12. शाश्त्री जी आप तो गजबे करते हो. हर बात पर कविता तैयार रहती है आपकी लेखनी पर. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  13. नमस्कार,
    जन्मदिन की शुभकामनायें हम तक प्रेम, स्नेह में लिपट पर पहुँचीं.
    शुभकामनायें हमेशा आगे बढ़ने की प्रेरणा देतीं हैं.
    आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपने तो पूरी तस्वीर ही खींच कर रख दी है।

    बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

    काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन), परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

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  15. बादलों ने रूप कभी नहीं रखा, रखते तो जान पाते उनके बारे में।

    उत्तर देंहटाएं
  16. बादलों की बदचलनी का
    ये अजीब दौर है।
    अति वृष्टि पर आपकी
    टिप्पणी काबिले गौर है।
    प्रभावकारी अभिव्यक्ति के लिए बधाई।
    -डॉ० डंडा लखनवी

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  17. वास्तव ही में इस बरस न जाने क्या हो रहा है.

    उत्तर देंहटाएं
  18. सुंदर भावो को उकेरा है आपने ..........बढ़िया

    उत्तर देंहटाएं
  19. यह कविता पढ़कर प्रसन्न मेरा मन हो रहा है!

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत भावयुक्‍त रचना .. पर अब बारिश समाप्ति की ओर है .. आप सबों को 24 तक ही झेलना है !!

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत सुंदर भाव ,अभिव्यत्ति और चित्र |
    बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  22. सचमुच इस बार तो
    पता ही नही चल पा रहा है कि
    बादलों को क्या हो गया है!

    उत्तर देंहटाएं
  23. बहुत ही सुन्‍दर भावमय प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  24. सुन्दर कविता और सुन्दर प्रस्तुति.. सच्चे भाव... गंभीर विषय...

    उत्तर देंहटाएं

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