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सोमवार, 20 सितंबर 2010

"संकर नस्लों को अब कैसे, गीता पाठ पढ़ाऊँ मैं?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पतझड़ के मौसम में,
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

बीज वही हैं, वही धरा है,
ताल-मेल अनुबन्ध नही,
हर बिरुअे पर
धान
लदे हैं,
लेकिन उनमें गन्ध नही,
खाद रसायन वाले देकर,
महक कहाँ से पाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

उड़ा ले गई पश्चिम वाली,
आँधी सब लज्जा-आभूषण,
गाँवों के अंचल में उभरा,
नगरों का चारित्रिक दूषण,
पककर हुए कठोर पात्र अब,
क्या आकार बनाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

गुरुवर से भयभीत छात्र,
अब नहीं दिखाई देते हैं,
शिष्यों से अध्यापक अब तो,
डरे-डरे से रहते हैं,
संकर नस्लों को अब कैसे,
गीता ज्ञान कराऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
पतझड़ के मौसम में,
सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
वीराने मरुथल में,
कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

27 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर कविता
    अच्छा सन्देश भी

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुंदर और सार्थक रचना के लिये आभार.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह जी वाह बहुत खूब

    अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्‍दर भावमय प्रस्‍तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. खाद रसायन वाले देकर, महक कहाँ से पाऊँ मैं?
    सुन्दर सन्देश की रचना
    बहुत खूब

    उत्तर देंहटाएं
  6. गीत बहुत अच्‍छा है लेकिन प्रजेन्‍टेशन से गीत नहीं लगता है। इसे सुधारेंगे तो पठनीय बनेगा।

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत ही भावमयी और सुन्दर सन्देश देती रचना। साथ ही दर्द भी उजागर हो गया।

    उत्तर देंहटाएं
  8. संकर नस्लों को अब कैसे, गीता ज्ञान कराऊँ मैं?
    वीराने मरुथल में, कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

    बहुत सुंदर प्रस्‍तुति !!

    उत्तर देंहटाएं
  9. आज भौतिक युग है …मनुष्य ही नहीं वनस्पतियों की नस्लों में भी मिलावट है …और आज के माहौल में किसी को ज्ञान देना असंभव स महसूस हो रहा है

    बहुत सुन्दर कविता ...सत्य को चरितार्थ करती हुई ...

    आपकी यह रचना कल के साप्ताहिक काव्य मंच ...चर्चा मंच पर ली जा रही है ...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  10. संकर नस्लों को अब कैसे,

    गीता ज्ञान कराऊँ मैं?

    इस पंक्ति को छोड़कर पूरी कविता आसानी से समझ आ गयी. धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  11. वाह यह अपनी नस्ल में एक नये तरह का गीत लग रहा है ।

    उत्तर देंहटाएं
  12. वीराने मरुथल में,
    कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?
    the dilemma of poetic heart found wonderful expression in this literary creation of yours!
    regards,

    उत्तर देंहटाएं
  13. आप कहां से लाते हैं इतने शब्द, फिर कैसे उन्हें पिरोते हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  14. आदरणीय
    मयंक जी
    सादर वन्दे.
    बहुत ही सुन्दर रचना है ये
    और इन पंक्तियों की कोई सानी नहीं है :
    उड़ा ले गई पश्चिम वाली,
    आँधी सब लज्जा-आभूषण,
    - विजय तिवारी 'किसलय '
    http://www.hindisahityasangam.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  15. संकर नस्लों को अब कैसे,
    गीता ज्ञान कराऊँ मैं?

    बहुत सुंदर गीत। आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  16. संकर नस्लों को अब कैसे,
    गीता ज्ञान कराऊँ मैं?
    वीराने मरुथल में,
    कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

    समय एक और कृष्ण के इन्तजार में है ...!

    उत्तर देंहटाएं
  17. सुन्दर तस्वीरों के साथ सुन्दर सन्देश देती हुई उम्दा रचना प्रस्तुत किया है आपने!

    उत्तर देंहटाएं
  18. क्या खूब कहा , क्या खूब कहा , और कहाँ ले जायेगी ये पश्चिमी हवा ?

    उत्तर देंहटाएं
  19. पतझड़ के मौसम में,
    सुन्दर सुमन कहाँ से लाऊँ मैं?
    वीराने मरुथल में,
    कैसे उपवन को चहकाऊँ मैं?

    क्यों डरते हो मौसम से
    कैसे बागबान के माली हो
    ना हार जो उस उपरवाले से...
    तुम धारा वासी से हारे हो ?

    उत्तर देंहटाएं
  20. बीज वही हैं, वही धरा है, ताल-मेल अनुबन्ध नही, हर बिरुअे पर धान लदे हैं,लेकिन उनमें गन्ध नही, खाद रसायन वाले देकर, महक कहाँ से पाऊँ मैं?.....bahut sundar aur saarthak bhav.....aabhar

    उत्तर देंहटाएं
  21. वाह जी वाह बहुत खूब

    अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं

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