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शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

“समय-चक्र” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सत्ता के रास्तों से,
वो दूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

अब ठाठ-बाट सारे,
सब हो गये किनारे,
मशहूर थे कभी जो,
मजबूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

लगते थे जो गरल से,
अब हो गये सरल से,
जागीरदार भी अब,
मजदूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

छल-छद्म के बहाने,
जग को लगे डराने,
सच्चाइयों के आगे,
बेनूर हो गये हैं।
सुख के हसीन सपने,
सब चूर हो गये हैं।।

21 टिप्‍पणियां:

  1. यही कामना है वर्तमान राजनीतिबाजों के लिये...

    उत्तर देंहटाएं
  2. समय किसी को नहीं बख्शता ...अच्छी रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया गीत...........

    प्रसन्न कर दिया शास्त्री जी !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर रचना शास्त्री जी, मैं गुनगुना रहा हूँ ;
    राम चन्द्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आयेगा
    हंस चुंगेगा दाना तिनका, कौवा मोती खायेगा ......

    उत्तर देंहटाएं
  5. छल-छद्म के बहाने,
    जग को लगे डराने,
    सच्चाइयों के आगे,
    बेनूर हो गये हैं।
    सुख के हसीन सपने,
    सब चूर हो गये हैं।।

    अच्छी रचना है ........

    कृपया इसे भी पढ़े :-
    क्या आप के बेटे के पास भी है सच्चे दोस्त ????

    उत्तर देंहटाएं
  6. लगते थे जो गरल से,
    अब हो गये सरल से,
    जागीरदार भी अब,
    मजदूर हो गये हैं।
    सुख के हसीन सपने,
    सब चूर हो गये हैं।।

    सारा सच उजागर कर दिया……………एक बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  7. अच्छी पंक्तिया लिखी है ........

    यहाँ भी आये और अपनी बात कहे :-
    क्यों बाँट रहे है ये छोटे शब्द समाज को ...?

    उत्तर देंहटाएं
  8. शायद इसी को कहते हैं समय की बात....... जो किसी के साथ भी हो सकता है...
    बहुत बढ़िया रचना

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सही लिखा है "लगते थे जो गरल से ,
    अब हो गए सरल हैं "
    बधाई
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  10. छल-छद्म के बहाने,
    जग को लगे डराने,
    सच्चाइयों के आगे,
    बेनूर हो गये हैं।
    बिल्कुल सही लिखा है आपने! बहुत सुन्दर और सठिक रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  11. सुन्दर और सार्थक भाव लिए रचना...बधाई.
    ______________
    'शब्द-शिखर'- 21 वीं सदी की बेटी.

    उत्तर देंहटाएं

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