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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

"आकाश में बादल घने हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 
कभी कुहरा, कभी सूरज, 
कभी आकाश में बादल घने हैं। 
दुःख और सुख भोगने को, 
जीव के तन-मन बने हैं।। 

आसमां पर चल रहे हैं, 
पाँव के नीचे धरा है, 
कल्पना में पल रहे हैं, 
सामने भोजन धरा है, 
पा लिया सब कुछ मगर, 
फिर भी बने हम अनमने हैं।
दुःख और सुख भोगने को, 
जीव के तन-मन बने हैं।। 

आयेंगे तो जायेंगे भी, 
ज़िन्दगी में खायेंगें भी, 
हाट मे सब कुछ सजा है, 
लायेंगे तो पायेंगे भी, 
धार निर्मल सामने है, 
किन्तु हम मल में सने हैं। 
दुःख और सुख भोगने को, 
जीव के तन-मन बने हैं।। 

देख कर करतूत अपनी, 
चाँद-सूरज हँस रहे हैं, 
आदमी को बस्तियों में, 
लोभ-लालच डस रहे हैं, 
काल की गोदी में, 
बैठे ही हुए सारे चने हैं। 
दुःख और सुख भोगने को, 
जीव के तन-मन बने हैं।। 

25 टिप्‍पणियां:

  1. ... बेहद प्रभावशाली अभिव्यक्ति है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. पा लिया सब कुछ मगर,
    फिर भी बने हम अनमने हैं।
    सुन्दर कविता है..
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. आयेंगे तो जायेंगे भी,
    ज़िन्दगी में खायेंगें भी,
    हाट मे सब कुछ सजा है,
    लायेंगे तो पायेंगे भी,
    धार निर्मल सामने है,
    किन्तु हम मल में सने हैं।
    दुःख और सुख भोगने को,
    जीव के तन-मन बने हैं।।
    सुन्दर !

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर प्रभावी रचना,...

    "काव्यान्जलि":

    नही सुरक्षित है अस्मत, घरके अंदर हो या बाहर
    अब फ़रियाद करे किससे,अपनों को भक्षक पाकर,

    उत्तर देंहटाएं
  5. आपकी सभी रचनाओं में जीवन के नए-नए अंदाज छिपे होते हैं | इतनी अच्छी पोस्ट हेतु आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  6. जीवन की सच्चाई लिख दी आपने ...
    बहुत सुंदर ....
    नव वर्ष की शुभकामनायें शास्त्री जी ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. जी हाँ ये मानव शरीर दुःख सुख भोगने के लिए ही मिला है ...यही तो जीवन है शास्त्री जी .........बिलकुल सही बात बताई है आपने !!!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. एकदम सटीक बात शास्त्री जी, आपको सपरिवार नववर्ष की शुभकामनायें!

    उत्तर देंहटाएं
  9. meethi thand jaisee meethi rachna....is baar aap mere blog par aaye nahee guru jee :-(

    उत्तर देंहटाएं
  10. Lajawaab ...

    हक़ीक़त को पाने के लिए गहरी नज़र, कड़ी साधना और निष्पक्ष विवेचन की ज़रूरत पड़ती है।

    http://vedquran.blogspot.com/2012/01/sufi-silsila-e-naqshbandiya.html

    उत्तर देंहटाएं
  11. नव-वर्ष की मंगल कामनाएं ||

    धनबाद में हाजिर हूँ --

    उत्तर देंहटाएं
  12. पा लिया सब कुछ मगर,
    फिर भी बने हम अनमने है…………सच्चाई को उकेरती सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  13. बहुत बढ़िया सर...
    विचारणीय रचना..

    नववर्ष शुभ हो.
    सादर...

    उत्तर देंहटाएं
  14. यही है जीवन की सच्चाई, कहीं मिलन तो कहीं विदाई ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  15. कभी कुहरा, कभी सूरज,
    कभी आकाश में बादल घने हैं।
    दुःख और सुख भोगने को,
    जीव के तन-मन बने हैं।।
    bahut sundar abhivykti hai....

    उत्तर देंहटाएं
  16. काल की गोदी में,
    बैठे ही हुए सारे चने हैं।
    दुःख और सुख भोगने को,
    जीव के तन-मन बने हैं।।

    शास्वत सत्य - वाह ! !

    उत्तर देंहटाएं

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