दिल हमारा अब दिवाना हो गया है। फिर शुरू मिलना-मिलाना हो गया है।। हाथ लेकर चल पड़े हम साथ में, प्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है। इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया, दर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है। सब अधूरे् स्वप्न पूरे हो गये, मीत सब अपना, जमाना हो गया है। दिल के गुलशन में बहारें छा गयीं, अब चमन, अपना ठिकाना हो गया है। तार मन-वीणा के, झंकृत हो गये, सुर में सम्भव गीत गाना हो गया है। मन-सुमन का “रूप” अब खिलने लगा, बन्द अब, आँसू बहाना हो गया है। |
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शुक्रवार, 27 जनवरी 2012
"अब चमन, अपना ठिकाना हो गया है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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आपका गीत प्यारा सा, हमें गुनगुनाना हो गया है
प्रत्युत्तर देंहटाएं//इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया,
प्रत्युत्तर देंहटाएंदर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है।
behtareen ghazal sir.. behtareen.. :)
हाथ लेकर चल पड़े हम साथ में,
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है।
इक नशा सा, जिन्दगी में छा गया,
दर्द-औ-गम, अपना पुराना हो गया है।
वाह-वाह... रूमानी हो गए और कर भी दिया !
बढिया रचना है बधाई।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही सुन्दर गजल शास्त्री जी । पढ़कर चित्त प्रसन्न हो गया ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंआ गये जो आपके इस ब्लॉग में, हृदय का "दीपक" जलाना हो गया ।
आभार ।
सुन्दर फूलो को देख..मन हमारा भी प्रसन्न होगया..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबसंत के आगमन पर सुंदर गजल
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khushiyon se bhari khoobsurat ghazal.
प्रत्युत्तर देंहटाएंदिल हमारा अब दिवाना हो गया है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंफिर शुरू मिलना-मिलाना हो गया है।।
हाथ लेकर चल पड़े हम साथ में,
प्रीत का मौसम, सुहाना हो गया है।
वसन्त का रंग चढना शुरु हो गया है………बहुत खूबसूरत प्रस्तुति।
बहुत खूब! वसन्त का प्रभाव झलकने लगा है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही अच्छा लगा कविता का ये मूड...
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत अच्छा लगा कविता का ये मूड.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुंदर चित्र से सजा यह पोस्ट सुहाना हो गया है|
प्रत्युत्तर देंहटाएंBhaavatmak gazal hai ... Anek rang liye ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंBahut Pyara Geet
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढिया रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबसंत पंचमी और माँ सरस्वती पूजा की हार्दिक शुभकामनाएँ । मेरे ब्लॉग "मेरी कविता" पर माँ शारदे को समर्पित 100वीं पोस्ट जरुर देखें ।
प्रत्युत्तर देंहटाएं"हे ज्ञान की देवी शारदे"
सुंदर रचना ...कृपया नयी-पुरानी हलचल पर पधारें ...आज आपकी कविता का लिंक वहां पर है ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ...बहुत ही बढि़या भाव संयोजन ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंखुशिया झलकती है आपकी इस रचना से..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबेहतरीन प्रस्तुति...
वाह - बहुत उम्दा ग़ज़ल है सर :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपका गीत बहुत अच्छा लगा
प्रत्युत्तर देंहटाएंबसंत ऋतू आई ..बहार आई .. खूबसूरत गज़ल ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबसंत पंचमी की शुभकामनायें
मन-सुमन का “रूप” अब खिलने लगा,
प्रत्युत्तर देंहटाएंबन्द अब, आँसू बहाना हो गया है।
मुबारक यह मदनोत्सव बसंत.
सुन्दर कविता है शास्त्री जी.
प्रत्युत्तर देंहटाएंहाथ लेकर चल पड़े हम साथ में,--
प्रत्युत्तर देंहटाएंएसा लगता है कि कोई कटा हुआ हाथ लेकर हम साथ चलपडे..
- चल पडे हम हाथ लेकर हाथ में.. ..सही रहेगा