मित्रों! पिछले वर्ष आज ही के दिन यह रचना लिखी थी! इस वर्ष भी इसे पुनः प्रसारित कर रहा हूँ! कायदे से धूप अब खिलने लगी है। लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा, भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा, चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं। लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये, सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये, पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है। लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं, बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं, अब मुहब्बत चाक-ए-दिल सिलने लगी है। लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।। |
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मंगलवार, 31 जनवरी 2012
"क़ायदे से धूप अब खिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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बहुत सुंदर ....प्रकृति से जुड़ा हम सबका मन.....
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह बहुत खूब!
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपकी लेखनी से तो हमारी लेखनी को भी उर्जा मिलने लगी है.
bahut sunder abhivyakti ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंपिछले वर्ष भी अच्छा लगा था और आज भी पढ़कर अच्छा लग रहा है...
प्रत्युत्तर देंहटाएंलिखी कभी जाये मगर हर बार की तरह उतनी ही खिली हुयी है ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंप्रकृति का सजीव चित्र खीचती बहुत ही सुन्दर रचना...
प्रत्युत्तर देंहटाएंगहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब प्रस्तुती!
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर शब्दों की कृति
प्रत्युत्तर देंहटाएंरचना कभी भी लिखी जाय भाव अच्छे होगें तो हमेशा पसंद आएगी,बहुत सुंदर प्रस्तुति अच्छी लगी.,
प्रत्युत्तर देंहटाएंwelcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....
बहुत सुंदर प्रस्तुति !
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ..वाह वाह..बहुत प्यारी कविता..
प्रत्युत्तर देंहटाएंkalamdaan.blogspot.com
बहुत सुन्दर.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर ....
प्रत्युत्तर देंहटाएंAapki rachnaaye padhkar sadaa hi oorjaa milti hai sir.. :)
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut bahut sundar rachna..
धीरे धीरे मन के कोनों में भी ऊष्मा पहुँचेगी।
प्रत्युत्तर देंहटाएंलेखनी को उर्जा मिलती रहे और नित नया रचते रहें।
प्रत्युत्तर देंहटाएंsundar shabdon se alankrit manohaari varnan.
प्रत्युत्तर देंहटाएंबढिया रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंbadhaai
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