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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

"क़ायदे से धूप अब खिलने लगी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों!
पिछले वर्ष आज ही के दिन
यह रचना लिखी थी!
इस वर्ष भी
इसे पुनः प्रसारित कर रहा हूँ!
कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा,
भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा,
चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं,
बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं,
अब मुहब्बत चाक-ए-दिल सिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

19 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर ....प्रकृति से जुड़ा हम सबका मन.....

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह बहुत खूब!

    आपकी लेखनी से तो हमारी लेखनी को भी उर्जा मिलने लगी है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. पिछले वर्ष भी अच्छा लगा था और आज भी पढ़कर अच्छा लग रहा है...

    उत्तर देंहटाएं
  4. लिखी कभी जाये मगर हर बार की तरह उतनी ही खिली हुयी है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. प्रकृति का सजीव चित्र खीचती बहुत ही सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  6. गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ लाजवाब प्रस्तुती!

    उत्तर देंहटाएं
  7. रचना कभी भी लिखी जाय भाव अच्छे होगें तो हमेशा पसंद आएगी,बहुत सुंदर प्रस्तुति अच्छी लगी.,

    welcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह ..वाह वाह..बहुत प्यारी कविता..
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. Aapki rachnaaye padhkar sadaa hi oorjaa milti hai sir.. :)

    bahut bahut sundar rachna..

    उत्तर देंहटाएं
  10. धीरे धीरे मन के कोनों में भी ऊष्मा पहुँचेगी।

    उत्तर देंहटाएं
  11. लेखनी को उर्जा मिलती रहे और नित नया रचते रहें।

    उत्तर देंहटाएं

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