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बुधवार, 11 जनवरी 2012

"फिर भी एकाकीपन है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


संगी-साथी और सहेली,
महल-दुमहले और हवेली,
इतना सब है पास हमारे,
फिर भी एकाकीपन है।

ईद-दिवाली, क्रिसमस-होली,
चहक रही, अभिनव रंगोली,
कल-कल. छल-छल करते धारे,
फिर भी एकाकीपन है।

मन बेगाना, हुआ दिवाना,
कितना है ये, क्रूर जमाना,
पास सभी हैं अपने सारे,
फिर भी एकाकीपन है।

तन रूखा है, मन भूखा है,
अँखियों का पानी सूखा है,
रात चाँदनी, दिन उजियारे,
फिर भी एकाकीपन है।

29 टिप्‍पणियां:

  1. वाह..!
    आज के युग में सबकुछ होते हुए भी मनुष्य कितना एकाकी है..
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  2. तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है,
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।सच ..सब कुछ होते हुए भी न जाने क्यों ये एकाकीपन की अनुभूति होती है .. अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. संगी-साथी और सहेली,
    महल-दुमहले और हवेली,
    इतना सब है पास हमारे,
    फिर भी एकाकीपन है।

    तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।

    बस केवल एकाकीपन......

    उत्तर देंहटाएं
  4. तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है,
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।

    ....सच में सब कुछ है...पर फिर भी एकाकीपन है..बहुत सटीक और सुन्दर प्रस्तुति...

    उत्तर देंहटाएं
  5. कुछ तो मन में काटता है..सुन्दर विश्लेषण

    उत्तर देंहटाएं
  6. यह एकाकीपन हमें हमारे बारे में सोचने को विवश करता है। और तब हम उस के रू-ब-रू होने की कामना करने लगते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुंदर प्रस्तुति,अकेला पन ही कुछ सोचने को मजबूर करता है,...
    welcome to new post --काव्यान्जलि--यह कदंम का पेड़--

    उत्तर देंहटाएं
  8. बहुत खूब..
    पास सभी हैं अपने सारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    सच कहा एकदम...

    उत्तर देंहटाएं
  9. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

    उत्तर देंहटाएं
  10. आपकी किसी नयी -पुरानी पोस्ट की हल चल बृहस्पतिवार 12- 01 -20 12 को यहाँ भी है

    ...नयी पुरानी हलचल में आज... उठ तोड़ पीड़ा के पहाड़

    उत्तर देंहटाएं
  11. दुनिया में अकेले आए हैं और अकेले ही चले जाना है.......

    उत्तर देंहटाएं
  12. अकेलापन आज के समय में अपनी सोच की ही उपज है |
    कविता बहुत अच्छी लगी |
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  13. कमाल की अभिव्यक्ति!! ला-जवाब

    तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है,
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-756:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    उत्तर देंहटाएं
  15. तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    गहन भाव संयोजन ...

    उत्तर देंहटाएं
  16. आधुनिक सुविधाओं के होते हुवे भी मन अकेला हो जाता है ... अकेलेपन को उजागर करती रचना ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. इस एकाकीपन से जीतना बड़ा कठिन है
    अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  18. यह एकाकीपन इसलिए भी हैकि आदमी ने मकान बनाया, दुकान बनाया. खेत और खलिहान बहाया. लेकिन स्वयं को इन्सान नहीं बनाया, आज मानव हैरान है, इस प्रगतिशीलता में ही परेशान है, क्योकि वह बाकी सब कुछ है, बस! एक इंसान नहीं है. इंसानियत को कुचलने वाला, मानवता को छोड़ने वाला की आखिर यही गति होती है. धन से भीड़ तो एकत्रित की जा सकती है , मित्र नहीं बनाया जा सकता. कोठियां तो बनवायी जा सकती है परंरू 'घर एक मंदिर' नहीं. सोने चाँदी के पलंग बनवाये जा सकते हैं पान्तु नींद नहीं खरीदी जा सकती. सुख-शान्ति नहीं लाया जा सकता. आदमी की आदमी अंततः बना पड़ेगा. इंसानियत और मानवता का पालन करना पड़ेगा. सचेत करती और सव परिष्कार का आह्वान करती एक सार्थक पोस्ट.आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  19. यह एकाकीपन इसलिए भी हैकि आदमी ने मकान बनाया, दुकान बनाया. खेत और खलिहान बहाया. लेकिन स्वयं को इन्सान नहीं बनाया, आज मानव हैरान है, इस प्रगतिशीलता में ही परेशान है, क्योकि वह बाकी सब कुछ है, बस! एक इंसान नहीं है. इंसानियत को कुचलने वाला, मानवता को छोड़ने वाला की आखिर यही गति होती है. धन से भीड़ तो एकत्रित की जा सकती है , मित्र नहीं बनाया जा सकता. कोठियां तो बनवायी जा सकती है परंरू 'घर एक मंदिर' नहीं. सोने चाँदी के पलंग बनवाये जा सकते हैं पान्तु नींद नहीं खरीदी जा सकती. सुख-शान्ति नहीं लाया जा सकता. आदमी की आदमी अंततः बना पड़ेगा. इंसानियत और मानवता का पालन करना पड़ेगा. सचेत करती और सव परिष्कार का आह्वान करती एक सार्थक पोस्ट.आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  20. संगी-साथी और सहेली,
    महल-दुमहले और हवेली,
    इतना सब है पास हमारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    मन हर कौना सूना है ......बहुत सुन्दर प्रस्तुति ...सब कुछ रीता रीता सा है ......

    उत्तर देंहटाएं
  21. ये आंसू मेरे दिल की जुबां हैं .......मैं रो दूं तो रोदें आंसू ,मैं हंस दूं तो हंस दें आंसू ....

    उत्तर देंहटाएं
  22. मन बेगाना, हुआ दिवाना,
    कितना है ये, क्रूर जमाना,
    पास सभी हैं अपने सारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    बेहतरीन अभिव्यक्ती ..

    उत्तर देंहटाएं
  23. तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है,
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    बहुत ही भावपूर्ण अभिव्यक्ति ..
    सादर अभिनन्दन !!

    उत्तर देंहटाएं
  24. तन रूखा है, मन भूखा है,
    अँखियों का पानी सूखा है
    रात चाँदनी, दिन उजियारे,
    फिर भी एकाकीपन है।
    vaah..bahut khoobsurat prastuti.aapko lohdi ki dheron shubhkamnayen.

    उत्तर देंहटाएं

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