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सोमवार, 30 जनवरी 2012

"एक दोहा-तीन मुक्तक" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


एक दोहा
देव भूमि में हो रहा, निर्वाचन का काम।
मैले इस तालाब में, कैसे करें हमाम।।
तीन मुक्तक
एक सुमन खिल जायेगा, मुरझायेंगे कई,
छल की भरी शराब है, बोतल बदल गई।
आये हैं लाखों खर्चकर, पायेंगे सौ करोड़,
मिल जायेगी कुर्सी जिसे, मुस्काएगा वही।।

सत्ता का सुख मिला तो भाग्यवान हो गया,
बिरुआ बबूल का तो नौजवान हो गया।
युवराज बनके उसने विरासत सम्भाल ली,
लिक्खा-पढ़ा हुआ तो बेजुबान हो गया।।

मक्कार-बेईमान ताल ठोक कर खड़े हुए,
ईमानदार जाँच के बबाल में पड़े हुए।
खाते लज़ीज़ माल देश का कसाब हैं,
गद्दार आज कीर्तिमान पर अड़े हुए।।

18 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर रचना,बेहतरीन वाजिब प्रस्तुति,
    welcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....

    उत्तर देंहटाएं
  2. अब क्या मिसाल दूं मैं आपके कलाम की.

    उत्तर देंहटाएं
  3. तीखा व्यंग्य किया है आपने अच्छा लगा |

    उत्तर देंहटाएं
  4. राजनीति पर दोहा और मुक्तक ...दोनों ही लाजबाब

    उत्तर देंहटाएं
  5. देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल पर बहुत अच्छा और सटीक लिखा।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर सृजन , बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत सुंदर और सटीक प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  8. SUNDAR RACHNA.KHOOB KAHI AUR HAM NE BHI KHOOB PADHI
    TEEKHI BAT,TEEN MUKTAKON ME.Badhaie

    उत्तर देंहटाएं
  9. वाह सभी एक से बढकर एक हैं , बहुत ही सुंदर

    उत्तर देंहटाएं
  10. देव भूमि में हो रहा, निर्वाचन का काम।
    मैले इस तालाब में, कैसे करें हमाम।।

    vaah dadu....
    kya andaaz hai..

    उत्तर देंहटाएं
  11. लजीज माल खाए कसाब
    देगा इसका कौन हिसाब
    सत्ता का ये खेल है न्यारा
    वाह जनाब! वाह वाह जनाब!!

    उत्तर देंहटाएं
  12. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

    उत्तर देंहटाएं

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