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शनिवार, 14 जनवरी 2012

"आइना सच-झूठ सब कुछ जानता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


आइना सच-झूठ सब कुछ जानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

झूठ, मक्कारी-फरेबी फल रही,
भेड़ियों को भेड़ बूढ़ी छल रही,
जुल्म कब इंसानियत को मानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

पिस रहा खुद्दार है, सुख भोगता गद्दार है,
बदले हुए हालात में गुम हो गया किरदार है,
बाप पर बेटा दुनाली तानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

बेसुरा सुर साज से आने लगा,
पेड़ अपने फल स्वयं खाने लगा,
भाई से तकरार भाई ठानता है।
मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. पिस रहा खुद्दार है, सुख भोगता गद्दार है,
    बदले हुए हालात में गुम हो गया किरदार है,
    बाप पर बेटा दुनाली तानता है।
    मन सुमन की गन्ध को पहचानता है।।
    शास्त्री जी
    सच्चाई को वंया करती सुन्दर रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  2. कड़वी सच्चाई ...
    उत्तम प्रस्तुति..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्छी सुंदर प्रस्तुति,बढ़िया अभिव्यक्ति रचना अच्छी लगी.....
    new post--काव्यान्जलि : हमदर्द.....

    उत्तर देंहटाएं
  4. संयत व् सार्थक सच्चाई को प्रस्तुत करती पोस्ट है|

    उत्तर देंहटाएं
  5. एक को उजागर करती हुई रचना !
    बहुत सुन्दर ! आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बखूबी से बयान किया है सच्चाई को..सच है मन रुपी आइना सब कुछ जानता है..
    kalamdaan.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  7. तरक्की का ये मोल तो चुकाना ही होगा...

    उत्तर देंहटाएं
  8. सच्चाई को प्रस्तुत करती सार्थक रचना।

    उत्तर देंहटाएं
  9. aaj kal ke samaaj ki kadvi sachchaai ko darshati post.bahut uttam.

    उत्तर देंहटाएं
  10. aaine ke 100 tukde...kar ke humne dekhe hain...ek mein bhee tanhaa thay 100 mein bhee akele hain!

    उत्तर देंहटाएं

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