तोते का मन फाके मस्ती में भी रहता था परिवार के संग हमेशा ही लड़ता था मेहनत की जंग उड़ता था ऊँची-ऊँची उड़ान कभी नही होती थी थकान जाता था रेगिस्तानी रेत में आता था धान के खेत में चखता था खट्टे-मीठे आम यही था उसका रोजमर्रा का काम एक दिन वह बहेलिए को भा गया लालचवश् उसके जाल मे आ गया तोते को बेच दिया एक साहुकार को अब वो तरस गया परिवार के प्यार को चाँदी का घर था सोने का आसन था बढ़िया भोजन था दुर्लभ व्यञ्जन थे रुचिकर पकवान थे बेमन से खाता था मन में पछताता था सब कुछ तो था लेकिन आजादी न थी सभी उसको करते थे प्यार हमेशा करते थे उसकी मनुहार अगर कुछ नही था तो वह था अपनों का निश्छल प्यार सुख का जीवन भी बन गया था भार धीरे-धीरे वह हो गया दुर्बल और कृश्-काय बन गया परजीवी और असहाय दे रहा था सन्देश सुना रहा था अपना उपदेश कभी भी नही होना परतन्त्र! यही है जीवन का मन्त्र! |
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सोमवार, 16 जनवरी 2012
"पिंजड़े का जीवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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कभी भी नही होना
प्रत्युत्तर देंहटाएंपरतन्त्र!
यही है
जीवन का मन्त्र!
सटीक और सुन्दर.
पिजरें के पंछी रे तेरा दरद न जाहे कोय
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत सुंदर सार्थक सटीक चित्रण,बेहतरीन पोस्ट
कभी भी नही होना
प्रत्युत्तर देंहटाएंपरतन्त्र!
यही है
जीवन का मन्त्र!
वाह ..बहुत ही अच्छी प्रस्तुति ।
partantra hokar jeena bhi kya jeena.bhaav vibhor kar diya aapki kavita ne.bahut badhia.
प्रत्युत्तर देंहटाएंपिंजड़े का जीवन ..
प्रत्युत्तर देंहटाएंसचमुच ..
पंख होते हुए भी उड़ न पाना ...
कितना कष्टदायी होता होगा..
ये नीरस जीवन..
kalamdaan.blogspot.com
वाह..
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत बढ़िया.
सादर.
तुलसीदास जी ने कहा है-"पराधीन सपनेहूँ सुख नहीं" बहुत मार्मिक चित्रण |
प्रत्युत्तर देंहटाएंआभार |
बहुत सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंकहाँ मिलें फिर मुक्त गगन पथ
प्रत्युत्तर देंहटाएंकभी भी नही होना
प्रत्युत्तर देंहटाएंपरतन्त्र!
यही है
जीवन का मन्त्र!
बेहतरीन अभिव्यक्ति
vikram7: महाशून्य से व्याह रचायें......
न हो अपनों का निश्छल प्यार
प्रत्युत्तर देंहटाएंसारी सुख-सुविधा है बेकार..
बड़ी सहजता से जीवन का मंत्र मिला, आभार.
पराधीनता तो पराधीनता ही है| बहुत मार्मिक कविता|
प्रत्युत्तर देंहटाएंअच्छा लगा,
प्रत्युत्तर देंहटाएंकविता कहने के अंदाज़ में जो
आपने परिवर्तन किया है।
सिर्फ़ कविता ही नहीं
जीवन का एक मंत्र भी दिया है।
मनोज कुमार द्वारा blogger.bounces.google.com
प्रत्युत्तर देंहटाएं8:27 अपराह्न (14 मिनट पहले)
मुझे
मनोज कुमार ने आपकी पोस्ट " "पिंजड़े का जीवन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
अच्छा लगा,
कविता कहने के अंदाज़ में जो
आपने परिवर्तन किया है।
सिर्फ़ कविता ही नहीं
जीवन का एक मंत्र भी दिया है।
उड़ान को रोका जाना निसंदेह बेहद दर्दनाक होता है मर्म को हिला दे ऐसी पोस्ट है \
प्रत्युत्तर देंहटाएंसटीक और बहुत सुन्दर....
प्रत्युत्तर देंहटाएंकभी भी नही होना
प्रत्युत्तर देंहटाएंपरतन्त्र!
यही है
जीवन का मन्त्र!
सुन्दर सीख देती सार्थक रचना।
पराधीन सुख सपनेहुँ नाहीं! बेहद मार्मिक चित्रण.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसार्थक रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंजीवन का अमूल्य मंत्र दिया आपने।
har kisi ko uddne ka adhikaar hai!
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत ही बढिया।
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खुबसूरत रचना अभिवयक्ति.........
प्रत्युत्तर देंहटाएंsashakt shabdon se kaid panchhi ka dard ukera hai. khoobsurat.
प्रत्युत्तर देंहटाएंमयंक जी सुन्दर रचना ...
प्रत्युत्तर देंहटाएंपिंजरा चाहे सोने का क्यों न हो लेकिन कैद में रहना किसी को अच्छा नहीं लगता ... हम जैसे मानव अपने स्वार्थ के लिए दूसरे प्राणियों को कैद कर रहे है जो कि अच्छा नहीं ... यदि हमें कैद कर के रखा जाय तो हम कैसे अनुभव करेंगे एस हमें सोचना चाहिए ...
बहुत अच्छा सन्देश आपकी एस कविता के माध्यम से ..