फूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये। भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।। काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं, वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये। देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल, तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये। सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में, मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये। आइना कमाल है, “रूप” इन्द्रज़ाल है, धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये। |
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बुधवार, 18 जनवरी 2012
"रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
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वाह!!! ..बहुत खूब लिखा है आपने..
प्रत्युत्तर देंहटाएंkalamdaan.blogspot.com
बहुत खूब सर...
प्रत्युत्तर देंहटाएंमज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
बहुत सार्थक बात.
सादर.
बहुत सुंदर
प्रत्युत्तर देंहटाएंक्या कहने
bahut baDhiyaa!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khoob tasveer bhi gajab ki hai rachna bhi gajab ki hai.
प्रत्युत्तर देंहटाएंवाह ...बहुत खूब।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
बहुत सुंदर !
सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।....बहुत खूब ..सटीक बात
बहुत सुन्दर !
प्रत्युत्तर देंहटाएंबहुत खूब..
प्रत्युत्तर देंहटाएंफूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये।
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।
बहुत सुंदर!
आभार !
बढिया है।
प्रत्युत्तर देंहटाएंसुन्दर और रोचक रचना..
प्रत्युत्तर देंहटाएंहर विधा में आप दक्ष हैं.
प्रत्युत्तर देंहटाएंसभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
प्रत्युत्तर देंहटाएंमज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
सारगर्भित पोस्ट है, यही सोच आज के चलन की|
ati sundar bhaav liye sundar rachana.
प्रत्युत्तर देंहटाएंvirendra dangwal parth -
प्रत्युत्तर देंहटाएंsundar rachna
Yesterday 23:09
बहुत बढ़िया प्रस्तुति,बेहतरीन
प्रत्युत्तर देंहटाएंwelcome to new post...वाह रे मंहगाई
बेहतरीन रचना।
प्रत्युत्तर देंहटाएंboht he vadiyaa!!!
प्रत्युत्तर देंहटाएंभाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।
प्रत्युत्तर देंहटाएंbahut khoob