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बुधवार, 18 जनवरी 2012

"रिवाज़-रीत बन गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


फूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये।
भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।

काफ़िला बना नहीं, पथ कभी मिला नहीं,
वर्तमान थे कभी, अब अतीत बन गये।

देह थी नवल-नवल, पंक में खिला कमल,
तोतली ज़ुबान की, बातचीत बन गये।

सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।

आइना कमाल है, रूप इन्द्रज़ाल है,
धूप और छाँव में, रिवाज़-रीत बन गये।

21 टिप्‍पणियां:

  1. वाह!!! ..बहुत खूब लिखा है आपने..
    kalamdaan.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब सर...
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
    बहुत सार्थक बात.
    सादर.

    जवाब देंहटाएं
  3. bahut khoob tasveer bhi gajab ki hai rachna bhi gajab ki hai.

    जवाब देंहटाएं
  4. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
    बहुत सुंदर !

    जवाब देंहटाएं
  5. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।....बहुत खूब ..सटीक बात

    जवाब देंहटाएं
  6. फूल हो गये ज़ुदा, शूल मीत बन गये।
    भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।
    बहुत सुंदर!
    आभार !

    जवाब देंहटाएं
  7. सभ्यता के फेर में, गन्दगी के ढेर में,
    मज़हबों की आड़ में, हार-जीत बन गये।
    सारगर्भित पोस्ट है, यही सोच आज के चलन की|

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत बढ़िया प्रस्तुति,बेहतरीन
    welcome to new post...वाह रे मंहगाई

    जवाब देंहटाएं
  9. भाव हो गये ख़ुदा, बोल गीत बन गये।।
    bahut khoob

    जवाब देंहटाएं

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