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मंगलवार, 3 अप्रैल 2012

"बात करते हैं हम पत्थरों से..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


बात करते हैं हम पत्थरों से सदा,
हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में।
प्यार करते हैं हम पत्थरों से सदा,
ये तो शामिल हमारे हैं संसार में।।


देवता हैं यही, ये ही भगवान हैं,
सभ्यता से भरी एक पहचान हैं,
हमने इनको सजाया है घर-द्वार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।


दर्द सहते हैं और आह भरते नही,
ये कभी सत्य कहने से डरते नही,
गर्जना है भरी इनकी हुंकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।


साथ करते नही सिरफिरों का कभी,
ध्यान धरते नही काफिरों का कभी,
ये तो रहते हैं भक्तों के अधिकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।

16 टिप्‍पणियां:

  1. साथ करते नही सिरफिरों का कभी,
    ध्यान धरते नही काफिरों का कभी,
    ये तो रहते हैं भक्तों के अधिकार में।
    ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।

    बहुत बढ़िया रचना,सुंदर मन की अभिव्यक्ति,बेहतरीन पोस्ट,....

    MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: मै तेरा घर बसाने आई हूँ...

    उत्तर देंहटाएं
  2. गंगा मेरी माँ का नाम ,बाप का नाम हिमालय .प्रकृति के प्रति यह मानवी दृष्टि ही तो पहाड़ (पहाड़ियों )की विशेषता है सहजता है .

    आप अनुकूल स्थान पायें सरकार में राज्य सभा में आयें ,शुभकामनाएं .

    उत्तर देंहटाएं
  3. पत्थर के परिवार में, शंकर जल कोहनूर ।

    तरह-तरह के अयस्क से, हैं पत्थर भरपूर ।

    हैं पत्थर भरपूर, मानिए लगें देवता ।

    करते इच्छा पूर, ध्यान कर भक्त सेवता ।

    पत्थर दिल था प्यार, ज़माना गया अठहत्तर ।

    माने पिछले साल, बने जब जीवन पत्थर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाकई पत्थर हमारे परिवार में सदियों से शमिल है...बहुत सुन्दर रचना!....धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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