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गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

"सच्चे कवि कहलाओगे तब" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


अपना धर्म निभाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

अभिनव कोई गीत बनाओ,
घूम-घूमकर उसे सुनाओ
स्नेह-सुधा की धार बहाओ
वसुधा को सरसाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

सुस्ती-आलस दूर भगा दो
देशप्रेम की अलख जगा दो
श्रम करने की ललक लगा दो
नवअंकुर उपजाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

देवताओं के परिवारों से
ऊबड़-खाबड़ गलियारों से
पर्वत के शीतल धारों से
नूतन गंगा लाओगे कब
जग को राह दिखाओगे कब

सही दिशा दुनिया को देना
अपनी कलम न रुकने देना
भाल न अपना झुकने देना
सच्चे कवि कहलाओगे तब
जग को राह दिखाओगे तब

17 टिप्‍पणियां:

  1. आत्मा में चेतना का प्रवाह करती प्रेरणादायी रचना....

    बहुत सुन्दर!




    कुँवर जी,

    जवाब देंहटाएं
  2. कब का चिंतन छोड़ो.. यही समय है..'अब '

    जवाब देंहटाएं
  3. कवियों को जिम्मेदारी का अहसास दिलाती सुन्दर रचना .

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर प्रेरक रचना ....आभार

    जवाब देंहटाएं
  5. sda ki tarh prerak post .mere blog ki nai post par svagat hae.

    जवाब देंहटाएं
  6. शुक्रवारीय चर्चा-मंच पर

    आप की उत्कृष्ट प्रस्तुति ।

    charchamanch.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  7. कवि को सार्थक कविता लिखने के लिए प्रेरित करती कविता!...बहुत सुन्दर भावार्थ!...आभार!

    जवाब देंहटाएं
  8. बहुत बढ़िया सर...
    प्रेरक रचना...

    सादर
    अनु

    जवाब देंहटाएं
  9. वाह प्रेरक व सुन्दर कविता।

    जवाब देंहटाएं
  10. अनुपम भाव संयोजन किये हैं आपने इस रचना में ...आभार ।

    जवाब देंहटाएं

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