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मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

"लक्ष्य बहुत संगीन हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


किसने अश्रु भरे सागर में,
पानी सब नमकीन हो गया।
नीलगगन में उड़ता बादल,
क्यों इतना ग़मग़ीन हो गया?

मैदानों से आकर नदियाँ,
तुझको जल से पोषित करतीं।
कलकल-छलछल, करती आतीं,
खुश होकर तेरा तन भरतीं।
फिर क्यों उनका मीठा पानी,
खारा और मलीन हो गया।।

रजनी में नभ की आँखों से,
शबनम की कुछ बून्द टपकतीं।
सुबह-सवेरे हरित पात पर,
मोती जैसी खूब चमकतीं।
सूरज की किरणों को पाकर,
सब अस्तित्व विलीन हो गया।।

रत्नों का लालच सबको है,
लेकिन हाथ नहीं आते हैं।
अमृत की चाहत में गागर,
 खारे जल से भर लाते हैं।
जीवन की आपाधापी में,
लक्ष्य बहुत संगीन हो गया।।

26 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर शब्दों से सजी हुई...सुन्दर रचना!...आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  2. जीवन की आपाधापी में,
    लक्ष्य बहुत संगीन हो गया।…………बिल्कुल सही कहा।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत गहन और बहुत संवेदनशील रचना ...शास्त्री जी ...बहुत अच्छी लगी ...!!
    आभार ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  4. चरफर चर्चा चल रही, मचता मंच धमाल |
    बढ़िया प्रस्तुति आपकी, करती यहाँ कमाल ||

    बुधवारीय चर्चा-मंच
    charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत बहुत सुन्दर ...!
    kalamdaan

    उत्तर देंहटाएं
  6. दर्शनीय प्राकृतिक उपालंभ

    उत्तर देंहटाएं
  7. सुंदर अभिव्यक्ति,बेहतरीन रचना,...

    MY RECENT POST काव्यान्जलि ...: कवि,...

    उत्तर देंहटाएं
  8. गेयात्मकता लिए सौन्दर्य बोध की रचना .दर्शन से संसिक्त .काव्य से अलंकृत .

    उत्तर देंहटाएं
  9. गेयात्मकता लिए सौन्दर्य बोध की रचना .दर्शन से संसिक्त .काव्य से अलंकृत .

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत सुंदर और सटीक भाव लिए अच्छी रचना

    उत्तर देंहटाएं
  11. शब्द भाव मन को छुये, सुंदर अर्थ महीन
    बादल क्यों गमगीन है, सागर क्यों नमकीन.

    वाह शास्त्री जी, अनमोल रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  12. रत्नों का लालच सबको है,
    लेकिन हाथ नहीं आते हैं।
    अमृत की चाहत में गागर,
    खारे जल से भर लाते हैं।

    ...बहुत खूब! बहुत सार्थक और सुन्दर रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  13. अमृत की चाहत में गागर, खारे जल से भर लाते हैं।जीवन की आपाधापी में,लक्ष्य बहुत संगीन हो गया।। wow!

    उत्तर देंहटाएं

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