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शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

इन्द्र बहादुर सेन, ‘कुँवर कान्त’ की एक रचना


♥♥ सौन्दर्य बोध ♥♥

शृंगार जितना भी
किया है तुमने...
वह तुम्हारी वास्तविक
सुन्दरता से 
बहुत कम है।
मैं जानता हूँ 
कि, तुम्हारा हृदय...
सागर से भी गहरा है।
तुम्हारे बोल...
मधु के घट हैं...
तुम्हारी लज्जा...
इन्द्रधनुष है।
तुम्हारे विचार...
गगन से भी अधिक
विस्तृत हैं।
भला इससे बढ़कर
सृष्टि का दूसरा निर्माण
और क्या हो सकता है?
और हमसे अच्छा
सुन्दरता का पारखी
भी, कौन मिल सकता है तुम्हें?
इसलिए...ऐ सुन्दरता की देवी...
तुम मेरे सामने...
इसी भाँति बैठी रहो।
मैं...
बंद करके भी आँखों को
देख सकता हूँ
तुम्हारे सोलह शृंगार सजे
रूप को 
एकदम स्पष्ट और वास्तविक...। 


इन्द्र बहादुर सेन, ‘कुँवर कान्त’
जन्म तिथिः 15 अगस्त 1952, गाँव जलूतरी, 
जनपद पिथौरागढ़
शिक्षा: आगरा विश्ववि. से स्नातक 
और कुमाऊँ वि.वि. से बी.एड.
लेखनः
नाटक संग्रह ‘सरहद’ 
काव्य संग्रह ‘मैली चाँदनी’ 
उपन्यास गुनाहों का जाल
उपलब्धिःसृजनदीपकला मंच पिथौरागढ़ से 
सम्ब सम्मान, 
साहित्य प्रभा देहरादून द्वारा 
‘राष्ट्रीय शिखर साहित्य सम्मान’ 
एवं छत्तीसगढ़ साहित्यकार मंच द्वारा 
‘हिरदे कविरत्न’ सम्मान 
‘पहल’ संस्था पिथौरागढ़ द्वारा सम्मानित 
संपर्कःजी.आईसी.गेट पिथौरागढ़

6 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदरता का वर्णन, कितने सुन्दर शब्दों में किया है आपने!....बहुत सुन्दर रचना!

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  2. गुरुवर के आदेश से , मंच रहा मैं साज ।
    निपटाने दिल्ली गये, एक जरुरी काज ।

    एक जरुरी काज, बधाई अग्रिम सादर ।
    मिले सफलता आज, सुनाएँ जल्दी आकर ।

    रविकर रहा पुकार, कृपा कर बंदापरवर ।
    अर्जी तेरे द्वार, सफल हों मेरे गुरुवर ।।

    शनिवार चर्चा मंच 842
    आपकी उत्कृष्ट रचना प्रस्तुत की गई है |

    charcamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह सौदर्य को कब श्रृंगार की जरूरत होती है ………बहुत सुन्दर रचना पढवायी।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सौन्दर्य न जाने कितने गुणों का समुच्चय है..सुन्दर कविता..

    उत्तर देंहटाएं

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