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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2012

"छप्पर अनोखा छा रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


हो गया मौसम गरम,
सूरज अनल बरसा रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

दर्द-औ-ग़म अपना छुपा,
हँसते रहो हर हाल में,
धैर्य मत खोना कभी,
विपरीत काल-कराल में,
चहकता कोमल सुमन,
सन्देश देता जा रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

घूमता है चक्र, दुख के बाद,
 सुख भी आयेगा,
कुछ दिनों के बाद बादल,
नेह भी बरसायेगा,
ग्रीष्म ही तरबूज, ककड़ी
और खीरे ला रहा।
गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

सर्दियों के बाद तरु,
पत्ते पुराने छोड़ता,
गर्मियों के वास्ते,
नवपल्लवों को ओढ़ता,
पथिक को छाया मिले,
छप्पर अनोखा छा रहा।
 गुलमोहर के पादपों का,
रूप सबको भा रहा।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. गर्म मौसम पूर बहार में आ गया!....सुन्दर रचना...आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  2. greeshma ritu ki mohak vyakhya .meri nai post par aapka svagat hae sir.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अभी तो पलाश ही खिले हैं...गुलमोहर के वृक्ष यहाँ सूने हैं...सुंदर कविता ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह बहुत सुन्दर भाव संयोजन

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर रचना .... प्रकृति के साथ दुख सुख का सामंजस्य बहुत अच्छा लगा ॥

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर और प्रभावपूर्ण रचना....आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. मैं यह खोज रहा हूँ कि आपसे कौन सा ऐसा विषय छूटा है जिस पर आपने एक सुन्दर कविता न लिखी हो.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुन्दर रचना....

    मैं भी यही सोच रही हूँ आपसे कौन सा ऐसा विषय छूटा है जिस पर आपने एक सुन्दर कविता न लिखी हो .....

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत से सवालों को हल करते हुए ख़ुद सवाल खड़ा करती हुई बेहतरीन तख़लीक़.

    उत्तर देंहटाएं
  10. वाह ...बहुत ही बढिया प्रस्‍तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  11. रास्ते भर गुलमोहरों के पेड़ों ने बरबस ध्यान आकर्षित कर लिया..

    उत्तर देंहटाएं
  12. चहकता कोमल सुमन,
    सन्देश देता जा रहा।
    अर्थ और भाव दोनों दृष्टि से अति उत्कृष्ट रचना .

    उत्तर देंहटाएं

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