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गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

"ग़ज़ल-आशा शैली हिमाचली" (प्रस्तोता-डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


  आज लूँ संवार ♥

मितवा मुस्काए देखो बन्दन वार
सुधि की तितली आई है मन के द्वार

झाड़-पोंछ पफेंक आई जीवन की कुण्ठा
घर की हर एक दिशा आज लूँ संवार

बरखा की रिमझिम है बून्दों का शोर
आया मधुमासों पर मादक निखार

वृक्षों पर चहकी है मैना मतवाली
जंगल में मोरों के नृत्य की झंकार

आज प्रीत आँचल उड़ाती हमारा
उनके सपने आये नयनों के द्वार
श्रीमती आशा शैली "हिमाचली"

14 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति का बहुत सुन्दर वर्णन!...सुन्दर प्रस्तुति!

    उत्तर देंहटाएं
  2. वाह क्या बात है इस आंचलिक गज़ल के ... मज़ा आ गयुआ ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह उत्कृष्ट प्रस्तुति
    चर्चा-मंच भी है |
    आइये कुछ अन्य लिंकों पर भी नजर डालिए |
    अग्रिम आभार |
    FRIDAY
    charchamanch.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  4. वाह, कोमल भावों की सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  5. वाह!!!!!!बहुत सुंदर गजल ,अच्छी प्रस्तुति,..

    MY RECENT POST...फुहार....: दो क्षणिकाऐ,...

    उत्तर देंहटाएं
  6. झाड़-पोंछ पफेंक आई जीवन की कुण्ठा
    घर की हर एक दिशा आज लूँ संवार

    बहुत खूब ... !!

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया सर................

    सादर.

    उत्तर देंहटाएं

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