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शुक्रवार, 3 जून 2011

"गीत-...कारवाँ गुजर रहा..." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



कारवाँ गुजर रहा , रास्तों को नापकर।
मंजिलें बुला रहीं, बढ़े चलो-बढ़े चलो!
है कठिन बहुत डगर, चलना देख-भालकर,
धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!

दलदलों में धँस न जाना, रास्ते सपाट हैं
ज़लज़लों में फँस न जाना, आँधियाँ विराट हैं,
रेत के समन्दरों को, कुशलता से पार कर,
धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!

मृगमरीचिका में, दूर-दूर तक सलिल नही,
ताप है समीर में, सुलभ-सुखद अनिल नहीं,
तन भरा है स्वेद से, देह चिपचिपा रही,
धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!

कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
दीप झिलमिला रहे, पाँव डगमगा रहे,
धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!

29 टिप्‍पणियां:

  1. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,

    बचे को भी अगर हम संवार लें तो जीना सार्थक हो जाये………………सुन्दर प्रस्तुति।

    उत्तर देंहटाएं
  2. दलदलों में धँस न जाना, रास्ते सपाट हैं
    ज़लज़लों में फँस न जाना, आँधियाँ विराट हैं,
    रेत के समन्दरों को, कुशलता से पार कर,
    धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! ख़ूबसूरत चित्र और शानदार रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  3. दलदलों में धँस न जाना, रास्ते सपाट हैं
    ज़लज़लों में फँस न जाना, आँधियाँ विराट हैं,
    रेत के समन्दरों को, कुशलता से पार कर,
    धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!

    dil jeet liya ..bahut hi gaherai bhari rachana

    उत्तर देंहटाएं
  4. "कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
    दीप झिलमिला रहे, पाँव डगमगा रहे,
    धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!"
    सर जी, इस उत्साहवर्धक एवं प्रेरणादायी गीत के लिए बहुत-बहुत बधाई.इसे पढ़ने का अवसर देने के लिए आभार.आपकी अन्य रचनाओं की तरह यह भी एक सन्देशपरक रचना है.दिल को छूता हुआ गीत.

    उत्तर देंहटाएं
  5. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है.

    सुन्दर है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुंदर प्रस्तुति जी धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  7. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
    स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

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  8. दीप झिलमिला रहे .....
    बढे चलो बढे चलो .......
    इधर धरा !उधर गगन ...
    डेट रहो बढे चलो ...
    आवाहन करती जोशपूर्ण जवानी ,जीवन की रवानी का, आपकी रचना!आभार ऐसे जोशपूर्ण आवाहन के लिए .

    उत्तर देंहटाएं
  9. जीवन की इस मरूभूमी मे उंट बन कर ही जिया जा सकता है ।

    उत्तर देंहटाएं
  10. जोश से भरी कविता हमें सतत बढ़ते रहने की प्रेरणा देती है।
    हरिऔध जी की याद आ गई इसे पढ़कर।
    देख कर वाधा विविध ....

    उत्तर देंहटाएं
  11. आपका हर एक गीत स्कूल में गाये जाने के योग्य है ! मुझे नहीं चाहिए ग्लूकोन डी ! बस मुझे कोई ऐसे गीत सुनाता चले !

    उत्तर देंहटाएं
  12. शास्त्री जी नमस्कार
    ये कविता तो मुझ पर एकदम फ़िट बैठती है, बस जरा सा नहीं, मेरा बहुत कुछ शेष है

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  13. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,

    ...बहुत सच कहा है. यह बचा समय भी सार्थकता से गुजर जाये, अब तो यही महत्वपूर्ण है...बहुत सुन्दर रचना..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  14. किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
    बहुत सुंदर प्रस्तुति.....

    उत्तर देंहटाएं
  15. बढ़िया बढिया बढ़िया बढ़िया...
    क्या कहूं और कैसे कहूं......

    उत्तर देंहटाएं
  16. कारवाँ गुजर रहा , रास्तों को नापकर।
    मंजिलें बुला रहीं, बढ़े चलो-बढ़े चलो!है कठिन बहुत डगर, चलना देख-भालकर,धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!bahut sunder bhav liye shaandaar rachanaa.badhaai sweekar karen.aabhaar.

    उत्तर देंहटाएं
  17. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है
    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति.

    उत्तर देंहटाएं
  18. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,


    बहुत सुन्दर और ओजपूर्ण रचना

    उत्तर देंहटाएं
  19. कट गया अधिक सफर, बस जरा सा शेष है,
    किन्तु जो बचा हुआ, वही तो कुछ विशेष है,
    कितनी सुंदर बात ........ प्रेरणादायी पंक्तियाँ

    उत्तर देंहटाएं
  20. जोश दिलाती हुई आपकी वाणी की आज देश को बहुत जरूरत है ! आभार!

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  21. दलदलों में धँस न जाना, रास्ते सपाट हैं
    ज़लज़लों में फँस न जाना, आँधियाँ विराट हैं,
    रेत के समन्दरों को, कुशलता से पार कर,
    धूप चिलचिला रही, बढ़े चलो-बढ़े चलो!!
    बहुत खूब .........हर शब्द को सार्थक करती आपकी लेखनी

    उत्तर देंहटाएं

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