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बुधवार, 29 जून 2011

"टिप्पणियों से मत मापो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कई मित्र टिप्पणियाँ अक्सर, सब रचनाओं पर देते हैं।
सुन्दर-बढ़िया लिख करके, निज जान छुड़ा भर लेते हैं।।

कुछ तो बिना पढ़े ही, केवल कॉपी-पेस्ट किया करते हैं।
खुश करने को बदले में, हमको प्रतिदान दिया करते हैं।।

रचना के बारे में भी तो, कुछ ना कुछ लिख दिया करो।
आँख मूँद कर, एक तरह की, नहीं टिप्पणी किया करो।।

पोस्ट अगर मन को ना भाये, पढ़ो और आगे बढ़ जाओ।
बिल्कुल नहीं जरूरी, तुम बदले में उसको टिपियाओ।।

यदि ज्ञानी, विद्वान-सुभट हो, प्रेम-भाव से समझाओ।
अपमानित करने वाली, दूजों को सीख न सिखलाओ।।

श्रेष्ठ लेख या रचनाओं को, टिप्पणियों से मत मापो।
सत्संग और प्रवचनों को, घटिया गानों से मत नापो।।

जालजगत पर जबसे आये, तबसे ही यह मान रहे हैं।
टिप्पणियों के भूखे गुणवानों को भी पहचान रहे हैं।।

दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।।

37 टिप्‍पणियां:

  1. sahi kaha
    achnha laga
    tippaniyan apni jagah hain aur rachna ka star apni jagah !

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया पंक्तियाँ रची आपने..... सिर्फ नाममात्र की टिपण्णी नहीं सार्थक संवाद हो विषय पर ......

    उत्तर देंहटाएं
  3. पोस्ट अगर मन को ना भाये, पढ़ो और आगे बढ़ जाओ।
    बिल्कुल नहीं जरूरी, तुम बदले में उसको टिपियाओ।।

    blogging me aisee dee shiksha ham isko hi apnayenge.
    aage achchhi tarah se padhkar apne vichar batlayenge.
    bahut achchha likha hai shastri ji,aaj ke bahut se blogars ko isse kafi kuchh sikhne ko milega.

    उत्तर देंहटाएं
  4. मुझे ख़ुशी है की आज इस मुद्दे पा आप भी कुछ बोले. और बोले तो बहुत खूब बोले.

    उत्तर देंहटाएं
  5. टिप्‍पणी व्‍यथा बनकर रह गयी है। विमर्श के स्‍थान पर आह, वाह ने ले ली है। आपने पद्य में इसे खूब कहा है। बघाई।

    उत्तर देंहटाएं
  6. जालजगत पर जबसे आये, तबसे ही यह मान रहे हैं।
    टिप्पणियों के भूखे गुणवानों को भी पहचान रहे हैं।।

    दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी खाद मिला करती है।
    चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।।

    वाह ...बहुत खूब बधाई स्‍वीकार कीजिये इस प्रस्‍तुति के लिये और आपकी पारखी नजर के लिये भी ।

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्री जी!

    बहुत खूब कहा।
    कथ्य को खूबसूरती से कविता में समेट लिया।
    सार्थक बात कही है आपने।
    पाठक आलोचक भी होता है।

    http://kavyarachana.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  8. मजा आ गया दादा अच्छी बारह बजाई क्या टिप्पणी करते हैं "अच्छा लगा मेरे ब्लाग पर आओगे तो और अच्छा लगेगा टिपिया कर जाओगे तो बहुत ही अच्छा लगेगा " :) :)

    उत्तर देंहटाएं
  9. अरे वाह! भाई जी वाह!

    आपने तो टिपण्णी करने से पहले ही प्रति-टिपण्णी कर डाली है.
    टिपण्णी करनेवालों को सुन्दर नसीहत दे,पोस्ट नई रच डाली है.

    अब इस टिपण्णी पर भी प्रति-टिपण्णी कीजियेगा और
    मेरे ब्लॉग पर आकर भी टिपण्णी की कृपा कीजियेगा.

    बहुत बहुत आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  10. टिप्पणियों का नहीं मोहताज लेखक,

    ब्लॉग ने लेकिन बनाया क्या करें ?


    दाद पाने की फितरतें मंच की --

    वो नहीं ही, भूल पाया क्या करें ||


    इरसाद औ इकरार ने रोशन किया

    हर मर्तवा इसको सजाया क्या करें |


    है फलां के सौ हमारे पाँच ही --

    राम को कौरव बनाया क्या करें |


    वो इधर आयें न आयें मेहरबां--

    टिप्पणी बेढब लगाया क्या करें ||



    आँख को हर चीज सुन्दर लग रही--

    आभार बस हमने जताया क्या करें ||

    उत्तर देंहटाएं
  11. सच्चाई प्रस्तुत कर दी है……………यही है यहाँ का सच्।

    उत्तर देंहटाएं
  12. 'रचना के बारे में भी तो कुछ न कुछ लिख दिया करो' बहुत सही फ़रमाया आपने। यह कट और पेस्ट की परम्परा निश्चित रूप से बहुत ही दुखद है। मेरा एक ब्लॉग जागरण जंक्शन पर है जिसका URL है http://cbmg.jagranjunction.com उसपर मैंने एक पोस्ट लगाई थी 'मनोरंजन के साथ खिलवाड़ : बदल रही परिभाषा' इसमें मीडिया की शिक़ायत दर्ज़ करायी गयी थी, मुझे याद है उसपर एक ही टिप्पणी आई थी और वह ऐसी कि मेरी पोस्ट पर भी भारी पड़ी। लोग मेरी पोस्ट कम उस टिप्पणी को जादा पढ़े। मुझे बड़ा सुक़ून मिला कि एक ही टिप्पणी पर सौ पर भारी। आप भी पढ़कर देखिएगा ज़ुरूर और बताइएगा कि कैसी रही मेरी पोस्ट नहीं वह टिप्पणी।
    -सादर, साग्रह
    -ग़ाफ़िलने। यह कट और पेस्ट की परम्परा निश्चित रूप से बहुत ही दुखद है। मेरा एक ब्लॉग जागरण जंक्शन पर है जिसका URL है http://cbmg.jagranjunction.com उसपर मैंने एक पोस्ट लगाई थी 'मनोरंजन के साथ खिलवाड़ : बदल रही परिभाषा' इसमें मीडिया की शिक़ायत दर्ज़ करायी गयी थी, मुझे याद है उसपर एक ही टिप्पणी आई थी और वह ऐसी कि मेरी पोस्ट पर भी भारी पड़ी। लोग मेरी पोस्ट कम उस टिप्पणी को जादा पढ़े। मुझे बड़ा सुक़ून मिला कि एक ही टिप्पणी पर सौ पर भारी। आप भी पढ़कर देखिएगा ज़ुरूर और बताइएगा कि कैसी रही मेरी पोस्ट नहीं वह टिप्पणी।
    -सादर, साग्रह
    -ग़ाफ़िल

    उत्तर देंहटाएं
  13. इतने जटिल बना दिये विषय को बड़ी सरलता से गा डाला आपने, बहुत ही प्रभावी।

    उत्तर देंहटाएं
  14. आज आपकी लेखनी भी चल गयी है टिप्पणियों पर ...:) सार्थक सन्देश देती रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  15. बात आप की सोलह आने खरी खरी है शास्त्री जी|
    इसी रोग से पीड़ित, हमको दिखते, चिट्ठे अपने भी||

    उत्तर देंहटाएं
  16. सार्थक सन्देश देती रचना|

    उत्तर देंहटाएं
  17. चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।।\\\


    -यही सत्य है....

    उत्तर देंहटाएं
  18. sahi kaha babu ji ....rachna ko tippdiyon se nahi toula ja sakta....

    उत्तर देंहटाएं
  19. श्रेष्ठ लेख या रचनाओं को, टिप्पणियों से मत मापो।
    सत्संग और प्रवचनों को, घटिया गानों से मत नापो।
    यह हुई ना बात अब आया मजा ....

    उत्तर देंहटाएं
  20. bahut achhi marg darashak rachana rahi aadarniy dr.saheb dushale m lapet kar parosi hai seekh bhari rachana sadhuwad

    उत्तर देंहटाएं
  21. अपनी शैली में अच्छी तरह समझाया है।

    उत्तर देंहटाएं
  22. कई मित्र टिप्पणियाँ अक्सर, सब रचनाओं पर देते हैं।
    सुन्दर-बढ़िया लिख करके, निज जान छुड़ा भर लेते हैं।।

    namaskaar shaastri ji. aapne aaj tippaniyon par bahut sarthak aur vichaarneey likha..lekin kuchh kahna chaahungi....ki aapki tippani meri mostly rachnaao par kuchh isi tarah ki hi mili hai...wah...bahut badhiya...bahut khoosurat se jyada kuchh nahi. maafi chaahungi kyuki janti hun apko kuchh bura laga hoga.

    उत्तर देंहटाएं
  23. सर ! क्या लिखूं आपके इस काव्य- वक्तव्य पर ,सब कुछ इतना प्रखरता से मुखरित हो गया की कुछ कहने की गुन्जायिस ही नहीं रही . ../ आभार करते हैं आपकी लेखनी एवं पटुता को / कह दिया उसको ,जो कह न सका कोई .....
    शुक्रिया सर ..

    उत्तर देंहटाएं
  24. इस सांत्वना रचना के लिए...धन्यवाद...इस टिप्पणी के चक्कर में ही अनजान लोगों से दुश्मनी हो रही है...भैया मैंने तो तुम्हारी पोस्ट पर बढ़िया-बढ़िया टिप्पणी की...और तुम कट-पेस्ट से काम चला गये...अच्छी व्यंग रचना...

    उत्तर देंहटाएं
  25. अजी अब कविता ओर गजल पढ कर हम ओर क्या लिख सकते हे? सुंदर, अति सुंदर, वगेरा वगेरा इस के सिवा क्या लिखे?

    उत्तर देंहटाएं
  26. सारगर्भित सन्देश पर पूर्ण सहमति.
    गमले में पौधों को देख कर विचार आया -
    दिल से निकले दाद बने ,कीमती आशीर्वाद बने
    पोषक तत्व परोसें ऐसे , पौधे खातिर खाद बने.

    उत्तर देंहटाएं
  27. गहराई से लिखी बात ...मैं सहमत हूँ ..क्योकि मैं उन चंद बेवकुफो में हूँ जो हर पोस्ट को बड़े लगन से पढ़ते हैं..फिर टिप्पणी देते हैं ...नतीजा यह होता है की एक दिन में मैं कुछ ही पोस्ट पढ़ पाती हूँ ..और कई अच्छे लेख हाथ से निकल जाते हैं ...

    उत्तर देंहटाएं
  28. सही लिखा है टिप्पणी की संख्या से कविता या रचना की गुणवत्ता को नहीं मापा जा सकता |पर मेरे ख्याल से प्रोत्साहित करने में क्या नुक्सान है
    आशा

    उत्तर देंहटाएं
  29. baat to sahee ki hai aapne guru ji, actually we should look at the quantity not the quality!

    उत्तर देंहटाएं
  30. मेरी ज़िंदगी की यह पहली पोस्ट है कि मैं इसके सभी 32 टिप्पणीकारों से सहमत होता हूँ और पोस्ट से तो सहमत ही हूँ।

    आशा है कि आपकी प्रतीक्षित पोस्ट भी जल्द प्राप्त होकर मन्ज़रे आम पर आएगी और सीधी राह दिखाएगी।

    धन्यवाद !
    .........
    वाक़ई,
    मज़ा आ गया ।
    कृपया हिंदी फ़ोरम पर तशरीफ़ लाकर देखें विशेष लेखमाला।
    http://hbfint.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  31. दुर्बल पौधों को ही ज्यादा पानी खाद मिला करती है ,
    चालू शेरों पर ही अकसर ज्यादा दाद मिला करती है ।
    बिलकुल नहीं ज़रूरी तुम बदले में उसको टिपियाओ
    पोस्ट अगर मन को न भाये पढो और आगे बढ़ जाओ ।
    बहुत खूब ब्लोगिया -गरों,और ब्लोगिया -गिरी की
    कलाई उतारी है ,
    ................................................................
    .....................,

    उत्तर देंहटाएं
  32. बेहद सटीक और आवश्यक बातों को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत किया है। जिनका अनुकरण करके लाभ उठाया जाना चाहिए।

    उत्तर देंहटाएं
  33. दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी खाद मिला करती है।
    चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।।

    बहुत कडुवी मगर सच्ची बात कही आपने...अंतर्जाल पर तो टिप्पणियों का गणित यूँ भी कुछ अलग ही किस्म का है...यहाँ पर विषय पर सार्थक चर्चा नहीं होती...बाद घिसे-पिटे दस बारह शब्दों में ही बात समाप्त हो जाती है!आपकी इस रचना का दर्द एक सच्चे लेखक के हृदय की वो पीड़ा है जो एक्स रे की पकड़ से बाहर की चीज़ है...
    सादर,
    सारिका मुकेश

    उत्तर देंहटाएं

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