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मंगलवार, 21 जून 2011

"गीत- प्यार हुआ आवारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 
सिसक रहा है आज वतन में, खुशियों का चौबारा।
छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

पगडण्डी पर चोर-लुटेरे, चौराहों पर डाकू,
रिश्तों की झाड़ी में पसरे, भाई बने लड़ाकू,
सम्बन्धों में गरल भरा है, प्यार हुआ आवारा।
छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

मन में कोरा स्वार्थ समाया, मुख पर मीठी बातें,
ममता-समता झूठी-झूठी, झूठी सब सौगातें,
अपने ही हो गये बिराने, देगा कौन सहारा?
छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

नहीं तमन्ना है दुलार की, नहीं प्यार में राहत,
सन्तानों को केवल है अब, अधिकारों की चाहत,
पर आने पर पंछी ने घर से कर लिया किनारा।
छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

27 टिप्‍पणियां:

  1. होगी ये सच्चाई
    पर कविता पसन्द नहीं आई
    क्योंकि इसमें कहीं पर भी मैं नहीं.
    क्या सच्चे लोगों की कोई गिनती नहीं !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. राजीव नन्दन द्विवेदी जी (अवध टाइम्स)
    आपका बहुत बहुत आभार!
    आप तो आफताब हैं!
    आपकी रौशनी से ही यह मयंक भी प्रकाशित है!

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद शास्त्री जी.
    और प्रति टिप्पणी नहीं करने वाले आप की यह प्रति टिप्पणी यह स्वतः प्रकट कर रही है कि आप अपने पाठकों व टिप्पणीकारों से कितना जुड़े रहते हैं.

    आलोचना तो कर ही दी है पर सच्ची आलोचना तभी पूर्ण होगी जब मैं यह कहूँ कि अब यही समाज के एक बड़े वर्ग का सत्य है और यह वर्ग निरंतर दीर्घता की और ही अग्रसर है.
    सत्योद्घाटित करती कविता.

    उत्तर देंहटाएं
  4. सन्तानों को केवल है अब, अधिकारों की चाहत,

    कर्तव्य - पथ

    बिसराता मनुष्य

    अधिकार पर

    हर्षाता युग

    निकृष्ट जीवन

    आत्मा अशुद्ध

    भूलते यथार्थ

    अनर्गलता पुष्ट

    चेतो रे चश्मों

    बहाओ प्रेम-नीर

    देखने को हर्षित

    देश है अधीर

    उत्तर देंहटाएं
  5. सही है शास्‍त्री जी समस्‍याओं का वर्णन है, पर व्‍यावहारि‍क नि‍दान भी दें जैसे कि‍, जाति‍प्रथा हटाने के लि‍ये चाहि‍ये कि‍ लोग सरनेम उपनाम का प्रयोग छोड़ दें, धर्मनि‍रपेक्षता के पचड़े से बचने के लि‍ये धर्म वैयक्‍ि‍तक चीज होनी चाहि‍ये मन्‍दि‍र, मस्‍ि‍जद,चर्च की जगह सुलभ शौचालय, रैन बसेरे, धर्मशालाएं, अस्‍पताल जरूरी हैं इत्‍यादि‍ इत्‍यादि‍।

    उत्तर देंहटाएं
  6. सत्य और सारी ... समाज का आइना है ये रचना ..

    उत्तर देंहटाएं
  7. Rajey Sha राजे_शा ने कहा…
    @ मन्‍दि‍र, मस्‍ि‍जद,चर्च की जगह सुलभ शौचालय, रैन बसेरे, धर्मशालाएं, अस्‍पताल जरूरी हैं इत्‍यादि‍ इत्‍यादि‍।


    sir jee unemployment badh jaayegi.
    bahut bade rojgaar kendra hain ye.

    kalpana kijiye jara---

    karodon logoe ke bhukhe marne ki noubat aa jayegi

    aur---
    duniya me apradh bhi badh jaayenge vo alag. kamsekam lakhon dukaane hainchadhave ki phool mala ki
    chandan agabatti ki.

    उत्तर देंहटाएं
  8. नहीं तमन्ना है दुलार की, नहीं प्यार में राहत,
    सन्तानों को केवल है अब, अधिकारों की चाहत,
    पर आने पर पंछी ने घर से कर लिया किनारा।
    छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

    आज की सच्चाई को खूबसूरती से उभारा है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. "pyaar huya aavaaraa .."naye ghar ki talash men ??achhi pakad hai apki shayad anubhav gahara hai sir ji sadhuwad

    उत्तर देंहटाएं
  10. नहीं तमन्ना है दुलार की, नहीं प्यार में राहत,
    सन्तानों को केवल है अब, अधिकारों की चाहत,
    पर आने पर पंछी ने घर से कर लिया किनारा।
    छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

    .....बहुत मर्मस्पर्शी..हरेक पंक्ति अंतस को छू जाती है..आज के यथार्थ का बहुत सशक्त चित्रण..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  11. गीत बहुत बढ़िया है.
    राजे शा साहब और रविकर जी की टिप्पणियां !

    उत्तर देंहटाएं
  12. छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

    khoobsurat

    उत्तर देंहटाएं
  13. छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

    एकदम सच कहा है...

    उत्तर देंहटाएं
  14. क्या भाईचारा छल फरेब से कभी मुक्त हो पायेगा भाई जी ?भाई का मतलब तलाश कर रहा हूँ.उसकी मुक्ति का इंतजार कर रहा हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  15. अक्सर जब हम कोई सच्ची किताब या कोई सच्चा सिद्धान्त या कोई सच्ची रचना पढ़ या सुन रहे होते हैं तो हमें लगता है कि इसको तो हम पहले से ही जानते हैं, यह कोई नई बात नहीं है, शायद इसलिए कि वह हमारी ही अन्तरात्मा की आवाज़ होती है किन्तु परीक्षा की घड़ी आने पर सब बातें भूल जाती हैं और हम फ़ेल हो जाते हैं ज़िन्दगी के इम्तिहान में। इसी लिए उन बातों को पुन: पुन: कहने, पढ़ने और दुहराने की महती आश्यकता होती है। इस उद्देश्य को बख़ूबी पूर्ण करती हुई समाज के कड़वे सच का बयान करती आपकी यह रचना अत्यन्त ही उपयोगी है। बधाई स्वीकार करें।

    उत्तर देंहटाएं
  16. "पर आने पर पंछी ने घर से कर लिया किनारा" और" प्यार हुआ आवारा" बेहतरीन बिम्बात्मक प्रयोग पूरी एक घर घर की देश की कथा कहानी लिए हुए .इतने सशक्त और बहु -उत्पादल लेखन के लिए बधाई भी आभार भी आप ऐसे ही प्रेरणा सेतु बने रहें .दीर्घायु होवें .

    उत्तर देंहटाएं
  17. ख़ूबसूरत रचना...बच्चों को उड़ने दीजिये...परिंदे भी बच्चों को छोड़ देते हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  18. मन में कोरा स्वार्थ समाया, मुख पर मीठी बातें,
    ममता-समता झूठी-झूठी, झूठी सब सौगातें,
    अपने ही हो गये बिराने, देगा कौन सहारा?
    छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।
    बिल्कुल सही कहा है आपने! सच्चाई को बड़े ही सुन्दरता से प्रस्तुत किया है! शानदार रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  19. प्यार हृदय से बाहर आये,
    अपना जीवन व्यर्थ न जाये।

    उत्तर देंहटाएं
  20. आज की स्थिति का सटीक वर्णन करती अच्छी रचना .

    उत्तर देंहटाएं
  21. मन में कोरा स्वार्थ समाया, मुख पर मीठी बातें,
    ममता-समता झूठी-झूठी, झूठी सब सौगातें,
    अपने ही हो गये बिराने, देगा कौन सहारा?
    छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।

    Bitter truth !
    sad indeed

    .

    उत्तर देंहटाएं
  22. "अब यही समाज के एक बड़े वर्ग का सत्य है और यह वर्ग निरंतर दीर्घता की और ही अग्रसर है" - सत्योद्घाटित करती कविता - बधाई शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  23. पगडण्डी पर चोर-लुटेरे, चौराहों पर डाकू,
    रिश्तों की झाड़ी में पसरे, भाई बने लड़ाकू,
    सम्बन्धों में गरल भरा है, प्यार हुआ आवारा।
    छल-फरेब की कारा में, जकड़ा है भाईचारा।।
    such baat hai aaj ki duniya bus matlab ki hi reh gayi hai.

    उत्तर देंहटाएं

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