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रविवार, 5 जून 2011

"करें विश्वास अब कैसे?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


करें विश्वास अब कैसे, सियासत के फकीरों पर
उड़ाते मौज़ जी भरकर, हमारे ही जखीरों पर

रँगे गीदड़ अमानत में ख़यानत कर रहे हैं अब
लगे हों खून के धब्बे, जहाँ के कुछ वज़ीरों पर

किये तैनात रखवाले, हमीं ने बिल्लियाँ-बिल्ले
समन्दर कर रहे दोहन, मगर बनकर जजीरों पर

जहाँ कानून हो अन्धा, वहाँ इंसाफ कैसे हो
अदालत में टिके हैं फैसले केवल नज़ीरों पर

पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया रूप है अपना
सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर

48 टिप्‍पणियां:

  1. जहाँ कानून हो अन्धा, वहाँ इंसाफ कैसे हो
    अदालत में टिके हैं फैसले केवल नज़ीरों पर

    सही बात कही है सर!

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. किये तैनात रखवाले, हमीं ने बिल्लियाँ-बिल्ले
    समन्दर कर रहे दोहन, मगर बनकर जजीरों पर!

    Well said !

    उत्तर देंहटाएं
  3. पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर

    इन्हें हमने बनाया,हमने ही इनको पाला
    क्या करे जो छीन लेते है अपना निवाला
    सामयिक धारदार रचना अभिवादन

    उत्तर देंहटाएं
  4. अब तो खादी खाद का काम करती है, तभी तो पहनने वाले को हरा-भरा, खुशहाल करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. जहाँ कानून हो अन्धा, वहाँ इंसाफ कैसे हो
    अदालत में टिके हैं फैसले केवल नज़ीरों पर

    पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पr aaj ki istithi ko batati hui saarthak rachanaa.badhaai sweekaren.aabhaar

    उत्तर देंहटाएं
  6. समसामयिक अच्छी रचना ... जनता तो हर तरह से ठगी जाती है

    उत्तर देंहटाएं
  7. पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर


    ....बहुत समसामयिक रचना...कब तक ये आवाज़ को दबा पायेंगे...जनता अब जाग चुकी है..आभार

    उत्तर देंहटाएं
  8. यूँ तो हर शेर वर्तमान को बखूबी चित्रित कर रहा है मगर,

    पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर

    मक्ते में मिसरा सानी मुझे बहुत पसंद आया ,शास्त्री जी.

    उत्तर देंहटाएं
  9. पूर्णतया समसामयिक .
    आपसे ऐसी ही कविता की आशा थी, आपने पूरी की कहने के पहले ही.
    धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  10. जनता अब जाग चुकी है..परिवर्तन का शुभारम्भ हो गया है...

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  11. क्या कहें दादा मन ही खराब है जिन पर भरोसा था वे ही खराब हैं उसूलों पर टिकते तो ये हाल न होता आज बूढ़ा विकलांग और बच्चा बेहाल न होता

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  12. पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर

    एकदम ठीक....

    उत्तर देंहटाएं
  13. सही बात कही है ! वर्तमान का यथार्थ है आपकी रचना में...

    उत्तर देंहटाएं
  14. सही बात कही है ! वर्तमान का यथार्थ है आपकी रचना में...

    उत्तर देंहटाएं
  15. आज के सन्दर्भ में बेहद महत्वपूर्ण रचना...सत्याग्रह को जिस तरह कुचला गया...इसे पूरे देश ने देखा...भूरे अंग्रेजों क जाने का ऐलान हो गया है...

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  16. लाजवाब!
    कल की प्रतिक्रिया में इतनी अच्छी ग़ज़ल, एक-एक शे’र सीधे दिल में उतर गए।

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  17. सटीक समय पर सटीक रचना |
    शुभकामनाएँ!

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  18. बहुत समसामयिक रचना...कब तक ये आवाज़ को दबा पायेंगे..

    उत्तर देंहटाएं
  19. समसामयिक रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  20. बहुत सुन्दर रचना लिखा है आपने! बिल्कुल सही बात का ज़िक्र किया है!

    उत्तर देंहटाएं
  21. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  22. जहाँ कानून हो अन्धा, वहाँ इंसाफ कैसे हो
    अदालत में टिके हैं फैसले केवल नज़ीरों पर

    पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर 1
    shandar rachna

    उत्तर देंहटाएं
  23. रक्षा करना जिनका काम , उन पर अब भरोसा कैसे हो ..
    अच्छी कविता !

    उत्तर देंहटाएं
  24. समसामयिक रचना हालात का सटीक चित्रण करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  25. समसामयिक रचना हालात का सटीक चित्रण करती है।

    उत्तर देंहटाएं
  26. जहाँ कानून हो अन्धा, वहाँ इंसाफ कैसे होअदालत में टिके हैं फैसले केवल नज़ीरों पर
    bilkul saty kaha apne . bahut sunder aur saty kaha apne...

    उत्तर देंहटाएं
  27. पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर ...

    सच कहा है ... पर बिल्ली कब तक खैर मनाएगी ...

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  28. आपकी बात से अक्षरश: सहमत हूं .. बेहद सटीक एवं सार्थक प्रस्‍तुति ।

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  29. bahut hi sundar gazal.
    ab kuchh privartan to hona bhi chaahiye

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  30. कानून और बल द्वारा आम जनता को त्रस्त किया जाएगा तो रक्षा के लिए कौन से हथियार प्रयुक्त होंगे?

    उत्तर देंहटाएं
  31. पहन खादी को बगुलों ने, दिखाया “रूप” है अपना
    सितम ढाया है ख़ाकी ने, हमेशा ही कबीरों पर

    ...

    हम असंख्य जानो के ह्रदय में पल रहे पीर को अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति दी है आपने....

    आभार इस अद्वितीय रचना के लिए...

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  32. जहां क़ानून अंधा हो ,वहां इन्साफ कैसे हो ,
    अदालत में टिके हैं फैसले ,केवल नजीरों पर ।
    पहन खादी को बगुलों ने ,दिखाया रूप है अपना ,
    सितम ढाया है ,खाकी ने हमेशा ही कबीरों पर ।
    डॉ रूप चंद शाष्त्री मयंक जी ."आज के हालात पे "हम सभी की आवाज़ बन गई है यह ग़ज़ल .भाव विरेचन हुआ है ,तनाव कम हुआ है यह ग़ज़ल पढ़कर .शुक्रिया आपका .

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  33. आपकी यह रचना कवि की चैतन्यता का उत्कृष्ट उदहारण है.

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  34. कल 21/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  35. आज की हकीकत बयां करती हुई रचना ..बहत खूब

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  36. बेहद सटीक एवं सार्थक प्रस्‍तुति ।

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  37. रँगे गीदड़ अमानत में ख़यानत कर रहे हैं अब
    लगे हों खून के धब्बे, जहाँ के कुछ वज़ीरों पर
    बहुत खूबसूरत रचना |

    उत्तर देंहटाएं

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