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शनिवार, 18 जून 2011

‘‘रंग बसन्ती पाया है’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


अमलताश के झूमर की, आभा-शोभा न्यारी है।
मनमोहक मुस्कान तुम्हारी, सबको लगती प्यारी है।।

लू के गरम थपेड़े खाकर, रंग बसन्ती पाया है।
पीले फूलों के गजरों से, सबका मन भरमाया है।।

तपती गरमी में तुमने, अपना सौन्दर्य निखारा है।
किसके इन्तजार में तुमने, अपना रूप संवारा है।।

दूर गगन से सूरज, यह सुन्दरता झाँक रहा है।
बिना पलक झपकाये, इन फूलों को ताक रहा है।।

अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार)

25 टिप्‍पणियां:

  1. अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
    तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।

    बहुत सुन्दर....

    उत्तर देंहटाएं
  2. सार्थक अवलोकन, सुन्दर कविता।

    उत्तर देंहटाएं
  3. अमलतास की सुंदरता पर आपने ब्लॉग में फिर बसंत खिला दिया ..सुन्दर कविता

    उत्तर देंहटाएं
  4. शास्त्री जी की खासियत, सीधी - साधी एक |
    पारस सा छू दें जिसे, बन जाता है नेक ||

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  5. लू के गरम थपेड़े खाकर, रंग बसन्ती पाया है।
    पीले फूलों के गजरों से, सबका मन भरमाया है ॥



    सुंदर लिखा है आपने

    उत्तर देंहटाएं
  6. अमलताश जैसी ही सुन्दर रचना.

    उत्तर देंहटाएं
  7. तपती गरमी में तुमने, अपना सौन्दर्य निखारा है।
    किसके इन्तजार में तुमने, अपना रूप संवारा है।।
    अद्भुत सुन्दर पंक्तियाँ! यही प्रकृति है! जितनी सुन्दर चित्र उतनी ही शानदार रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  8. वाह बहुत सुन्दर और सार्थक पंक्तियाँ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
    तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।

    बेहतरीन रचना .......

    उत्तर देंहटाएं
  10. अमलतास पर कविता लिखना एक सुखद अनुभव रहा होगा...जितने ख़ूबसूरत ये फूल हैं उतनी ही ख़ूबसूरत रचना...

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  11. अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
    तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।

    सटीक सन्देश देती सुन्दर रचना

    उत्तर देंहटाएं
  12. अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
    तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।

    क्या लाइन है? सच्चाई बयान करती हुई...बहुत सुन्दर...आभार एवं बधाई सर!

    उत्तर देंहटाएं
  13. अग्नि में तप कर, कुन्दन का रूप निखर जाता है।
    तप करके प्राणी, ईश्वर से सिद्धी का वर पाता है।।

    seekh deti hui sunder rachna ...!!

    उत्तर देंहटाएं
  14. प्रकृति ने तो दिया है असीमित खुशियों का शहर ,उसे खोजने वाले कम मिलते हैं आप जैसे ,/ सृजन &सृजन शीलता ,एक दुसरे के पर्याय हो चले हैं / बहुत सुंदर ...

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  15. लय, प्रवाह और सारल्य का ज़वाब नहीं|

    उत्तर देंहटाएं
  16. प्रकृति के विविध रूपों का सहज वर्णन

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  17. I have read so many articles or reviews about the blogger lovers but this post is really a good piece of writing, keep it up.
    my webpage :: taniatapia.Thumblogger.com

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