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बुधवार, 8 जून 2011

"बिना बुलाए मेहमानों से.." (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मित्रों! कुछ दिने पहले मैंने यह रचना लिखी थी
मगर इसको लिखकर भूल गया था।
आज जब ड्राफ्ट में देखा तो
इस रचना का ध्यान आया।
इसलिए इसे आज प्रकाशित कर रहा हूँ!


ग्रस्त बहुत हूँ, घिर-घिर आये तूफानों से।
त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

शान्त सरोवर से उठती हैं जब सूनामी,
जन-जीवन बन जाता तब इतिहास-कहानी,
पस्त बहुत हूँ, काले-गोरे घनश्यामों से।
त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

नहीं बचे हैं नीड, नहीं कोई है घर-दर,
सुस्ताने को आसमान का साया सर पर,
सुस्त बहुत हूँ, नष्ट हुए निज सामानों से।
त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

बचा न कुछ भी, जितना किया हुआ था संचित,
क्षणभर में कर दिया, सभी से सब कुछ वंचित,
असन्तुष्ट हूँ बहुत, कुदरती फरमानों से।
त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

26 टिप्‍पणियां:

  1. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
    रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    बेहतरीन है सर!

    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. भगवान् ना करें यह मेहमान किसी के भी घर जाएँ !

    उत्तर देंहटाएं
  3. ग्रस्त बहुत हूँ, घिर-घिर आये तूफानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    बहुत सुन्दर ग़ज़ल शास्त्री जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बचा न कुछ भी, जितना किया हुआ था संचित,
    क्षणभर में कर दिया, सभी से सब कुछ वंचित,
    असन्तुष्ट हूँ बहुत, कुदरती फरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।bahut sarthak gajal.badhaai sweekaren.

    उत्तर देंहटाएं
  5. हम भी त्रस्त हैं, ऐसे ही मेहमानों से।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बचा न कुछ भी, जितना किया हुआ था संचित,
    क्षणभर में कर दिया, सभी से सब कुछ वंचित,
    असन्तुष्ट हूँ बहुत, कुदरती फरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    Marvelous creation Shastri ji.

    .

    उत्तर देंहटाएं
  7. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
    रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    बहुत ही सुंदर....

    उत्तर देंहटाएं
  8. कुदरती मेहमानों से हमेशा खतरा बना रहता है।

    उत्तर देंहटाएं
  9. सुस्त बहुत हूँ, नष्ट हुए निज सामानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    बहुत सही कहा है आपने....सभी परेशान है ...बिन बुलाये मेहमानों से

    उत्तर देंहटाएं
  10. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
    रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    सुंदर ...सभी के मन की बात कही आपने....

    उत्तर देंहटाएं
  11. वो भूली दास्ताँ ...लो फिर याद आ गयी ...
    अच्छा हुआ शास्त्री जी ! एक सुंदर रचना से मुलाकात हो गयी |

    शुभकामनाएँ |

    उत्तर देंहटाएं
  12. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
    रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति ...

    उत्तर देंहटाएं
  13. आपकी पारखी नजर और अथाह शब्द कोष.. क्या बात है...

    उत्तर देंहटाएं
  14. सभी टिप्पणीदाताओं का आभार!
    मगर यह गीत है ग़ज़ल नहीं है!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,
    रुष्ट बहुत हूँ, सजे-सजाए अरमानों से।
    त्रस्त बहुत हूँ, बिना बुलाए मेहमानों से।।
    बहुत सुन्दर और शानदार ग़ज़ल!

    उत्तर देंहटाएं
  16. सरिताओं की उलटी बहती हैं धाराएँ,
    सागर में अब कैसे, सलिला जल को लाएँ,

    बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  17. बहुत सुंदर लिखा है आपने दादा

    उत्तर देंहटाएं
  18. पूरी पोस्ट जबर्दस्त है शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  19. हमेशा की तरह बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

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  20. पहली से लेकर आखरी लाइन तक में दर्द है ! कहते हैं की सारे मास्टरपीस हमेशा दर्द से ही उपजते हैं .

    उत्तर देंहटाएं
  21. बहुत खूब !हमेशा की तरह शिखर पर अश -आर आपके .पूछ लीजिये -अतिथि तुम कब जाओगे ?

    उत्तर देंहटाएं

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