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सोमवार, 6 जून 2011

"ग़ज़ल...छल रहा “रूप" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 
दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है

कल तलक की थी वफा-प्यार की बातें कितनी
आज बन करके सितमगर सा कहर ढाया है

इश्क के पेंच लड़ाने में खिलाड़ी हारा
आज अनाड़ी का मुकद्दर भी निखर आया है

नगमगी ख्वाब मिटे, झाग-बुलबुलों जैसे
हमने अमृत के भलावे में ज़हर खाया है

छल रहा रूप आइने को बहुत,
आज सिंगार छलावा सा सँवर आया है  

33 टिप्‍पणियां:

  1. rang aata ja raha hai roz naya naya

    mayank ji.........irshya hoti hai aapse !

    उत्तर देंहटाएं
  2. इश्क के पेंच लड़ाने में खिलाड़ी हारा
    आज अनाड़ी का मुकद्दर भी निखर आया है
    हर शेर खुबसूरत ग़ज़ल का यह शेर तो कमाल का है

    उत्तर देंहटाएं
  3. behatarin nazm --

    दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
    खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है

    shukriya ji .

    उत्तर देंहटाएं
  4. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 07- 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  5. इश्क के पेंच लड़ाने में खिलाड़ी हारा
    आज अनाड़ी का मुकद्दर भी निखर आया
    bahut sundar prastuti.shastri ji aapki ye panktiyan yadi kuchh mod dee jayen to ham jaise bloggars par sateek baithengi-
    blog ke page likhne me laga
    aaj anadi ka muqaddar bhi nikhr aaya.
    ye anadi ham hi to hain jo yogya blogs kee avhelna kar baithte hain.aapke blog par aana chhodna kya hamare vash me hai ye to hamari aur jagah vyastta kee truti hai.isiliye kshma prarthi hain.

    उत्तर देंहटाएं
  6. आईना भी छल रहा,
    रूप नित्य जल रहा।

    उत्तर देंहटाएं
  7. नग़- मगी खाब मिटे झाग बुलबुलों जैसे ,हमने अमृत के बहलावे में ज़हर खाया है ।
    खूबसूरत हैं अश -आर गज़लके,"नग़ -मगी ख़्वाब प्रयोग भला और नया लगा .मुबाराक बाद .

    उत्तर देंहटाएं
  8. हमने अमृत के भुलावे में जहर खाया है ...
    बहुत खूब !

    उत्तर देंहटाएं
  9. bhut sundar likha hai
    kabhi hamre blog par bhi aaye
    vikasgarg23.blogspot.com

    उत्तर देंहटाएं
  10. इश्क के पेंच लड़ाने में खिलाड़ी हारा
    आज अनाड़ी का मुकद्दर भी निखर आया है

    बहुत खूब शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  11. इश्क के पेंच लड़ाने में खिलाड़ी हारा
    आज अनाड़ी का मुकद्दर भी निखर आया है

    बहुत खूब शास्त्री जी

    ( ये न समझियेगा कि ऊपर की टिप्पणी की नक़ल कर ली है.)

    उत्तर देंहटाएं
  12. छल रहा “रूप” आइने को बहुत,
    आज सिंगार छलावा सा सँवर आया है ...
    वाह! क्या बात है! तस्वीर के साथ साथ इन पंक्तियों का तालमेल बहुत ही बढ़िया लगा! बेहद सुन्दर रचना!

    उत्तर देंहटाएं
  13. उम्दा ग़ज़ल शास्त्री जी .....हर शेर बेहतरीन

    आप जैसे साहित्य साधक हम सबों के मार्ग दर्शक और प्रेरणास्रोत हैं , आशीष देते रहें कृपया ..

    उत्तर देंहटाएं
  14. आईना भी छल रहा,
    रूप नित्य जल रहा।
    सुन्दर अभिव्यक्ति्….. मन मोह लिया.शास्त्री जी

    उत्तर देंहटाएं
  15. वाह वाह बहुत ही सुन्दर और मनमोहक गज़ल्।

    उत्तर देंहटाएं
  16. दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
    खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है ...
    बहुत खूब .. दर्द का समुंदर ... लाजवाब ग़ज़ल है शास्त्री जी ... मुखड़ा ही इतना कमाल है की क्या कहूँ ...

    उत्तर देंहटाएं
  17. दर्देदिल ग़ज़ल के मिसरों में उभर आया है
    खुश्क आँखों में समन्दर सा उतर आया है
    bahut khoob

    उत्तर देंहटाएं
  18. बेहतरीन ग़ज़ल ,कुछ लिखने की प्रेरणा देती हुई.....
    हमने अमृत के भलावे में ज़हर खाया है
    हाय जालिम ने बड़े प्यार से खिलाया है.
    पहले सा रूप आजकल नहीं दिखाता है
    बस इसी बात पे शीशे पे सितम ढाया है.

    उत्तर देंहटाएं

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