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सोमवार, 13 जून 2011

"कव्वाली-...शर्मशारी में दिन सारा बीता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

"कव्वाली"


बात करने का मन ही नहीं है,

लिखने-पढ़ने का मन भी नही है।


आशिकी मिल गई खाक में अब,

गीत रचने का मन ही नही है।


अब तो बापू की याद आ गई है,

इश्क करने का मन ही नहीं है।


प्रातः की ऊर्मियों ने झिंझोड़ा,

मेरा मिलने का मन ही नहीं है।


दिल के अरमान सब सो गये हैं,

अब सँवरने का मन ही नहीं है।


वक्त की आँधियों ने डराया,

वार करने का मन ही नहीं है।


एक हमले ने ताकत है छीनी,

लड़ने-भिड़ने का मन ही नहीं है।


शर्मशारी में दिन सारा बीता,

शेर गढ़ने का मन ही नहीं है।

15 टिप्‍पणियां:

  1. सच कहें तो अनशनकारी से लेकर अत्याचारी तक दोनो को देख मन खट्टा है अब अन्ना से ही आस टिकी है ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मन के हारे हार है ...मन के जीते जीत ....
    आपकी कव्वाली पढने के बाद फिर से एक बार ये बात याद आ गई

    --
    anu radha

    उत्तर देंहटाएं
  3. आपकी रचना यहां भ्रमण पर है आप भी घूमते हुए आइये स्‍वागत है
    http://tetalaa.blogspot.com/

    कल से जो हाल है हमारा भी शायद उस पर भी आपकी ये रचना सही बैठती है।

    उत्तर देंहटाएं
  4. एक हमले ने ताकत है छीनी,

    लड़ने-भिड़ने का मन ही नहीं है।


    शर्मशारी में दिन सारा बीता,

    शेर गढ़ने का मन ही नहीं है।


    इतनी निराशा कयों सर? आपलोगों का यह हाल होगा तो नौजवानों को कौन ढाँढस देगा? कौन उम्मीद बँधाएगा? वैसे रचना तो बहुत अच्छी है पर आशान्वित रहना हमारी आवश्यकता और मज़बूरी दोनो है।...सादर

    उत्तर देंहटाएं
  5. अच्छा लिखा है आपने ! दिल कुछ हुआ !मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है !
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  6. यूँ निराश होने से भी काम नहीं चलेगा ...फिर से मन को उठाना होगा ..जगाना होगा .. अच्छी प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  7. शास्त्री जी , आप तो ज्ञानी है,और आप कह भी ठीक रहें है !

    वक्त की आँधियों ने डराया,
    वार करने का मन ही नहीं है।

    ये वक्त भी निकल जायेगा ...
    शुभकानाएं !

    उत्तर देंहटाएं
  8. आपने बहुत सुंदरता से हरेक दिल के दर्द को शब्द दिए हैं..अब तो केवल अन्ना का सहारा है, वैसे इस सरकार का कुछ भी भरोसा नहीं. बहुत सुन्दर रचना...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी (कोई पुरानी या नयी ) प्रस्तुति मंगलवार 14 - 06 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच- ५० ..चर्चामंच

    उत्तर देंहटाएं
  10. श्रद्धेय शास्त्री जी
    टिप्पणी लिखने का मन तो बनाना ही पडेगा,

    चाहे ४ जून से एक जून भी चैन न आया हो |
    और बर्बरता ने सैकड़ों जुल्म ढाया हो ||

    उत्तर देंहटाएं
  11. देश में जो माहौल है इस समय , उससे तो मन खिन्न होना ही है । फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है।

    उत्तर देंहटाएं

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